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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-99
ब्रह्मणां भुवने वसतां ये नैव भेदं कुर्वन्ति ।
ते परमात्मप्रकाशकराः योगिनः विमलं मन्यन्ते ।।९९।।
बंभहं इत्यादि । बंभहं ब्रह्मणः शुद्धात्मनः । किं कुर्वतः । भुवणि वसंताहं भुवने
त्रिभुवने वसंतः तिष्ठतः जे णवि भेउ करंति ये नैव भेदं कुर्वन्ति । केन । शुद्धसंग्रहनयेन
ते परमप्प-पयासयर ते ज्ञानिनः परमात्मस्वरूपस्य प्रकाशकाः सन्त जोइय हे योगिन्
अथवा बहुवचनेन हे योगिनः । किं कुर्वन्ति । विमलु मुणंति विमलं संशयादिरहितं
शुद्धात्मस्वरूपं मन्यन्ते जानन्तीति । तद्यथा । यद्यपि जीवराश्यपेक्षया तेषामेकत्वं भण्यते
तथापि व्यक्त्यपेक्षया प्रदेशभेदेन भिन्नत्वं नगरस्य गृहादिपुरुषादिभेदवत् । कश्चिदाह ।
यथैकोऽपि चन्द्रमा बहुजलघटेषु भिन्नभिन्नरूपेण द्रश्यते तथैकोऽपि जीवो बहुशरीरेषु
have, jIvonI jAtirUpe (jIvanI jAtinI apekShAe) shuddhAtmAnun ekatva darshAve chhe —
bhAvArtha — jevI rIte nagaranA ghar Adi ane puruShAdinun potAnI jAtinI apekShAe
ekapaNun chhe topaN vyaktinI apekShAe temanun bhinnapaNun chhe tevI rIte joke jIvarAshinI apekShAe
temanun ekatva kahyun chhe, topaN vyakti-apekShAe pradeshabhedathI temanun bhinnapaNun chhe.
ahIn, koI kahe chhe ke – jevI rIte chandra ek hovA chhatAn jaLathI bharelA anek
ghaDAmAn bhinna-bhinnarUpe dekhAy chhe. tevI rIte jIv ek hovA chhatAn paN anek sharIramAn
bhinna-bhinnarUpe dekhAy chhe. shrI guru temanun samAdhAn kare chhe — jaLathI bharelA anek ghaDAmAn
chandranA kiraNonI upAdhinA vishe jaLajAtinA pudgalo ja chandrAkAre pariNamyA chhe, paN
गाथा – ९९
अन्वयार्थ : — [भुवने ] इस लोकमें [वसन्तः ] रहनेवाले [ब्रह्मणः ] जीवोंका [भेदं ]
भेद [नैव ] नहीं [कुर्वति ] करते हैं, [ते ] वे [परमात्मप्रकाशकराः ] परमात्माके प्रकाश
करनेवाले [योगिन् ] योगी, [विमलं ] अपने निर्मल आत्माको [जानंति ] जानते हैं । इसमें संदेह
नहीं है ।
भावार्थ : — यद्यपि जीव – राशिकी अपेक्षा जीवोंकी एकता है, तो भी प्रदेशभेदसे
प्रगटरूप सब जुदे-जुदे हैं । जैसे वृक्ष जातिकर वृक्षोंका एकपना है, तो भी सब वृक्ष जुदे
जुदे हैं, और पहाड़ – जातिसे सब पहाड़ोंका एकत्व है, तो भी सब जुदे-जुदे हैं, तथा रत्न –
जातिसे रत्नोंका एकत्व है, परन्तु सब रत्न पृथक् पृथक् हैं, घट – जातिकी अपेक्षा सब
घटोंका एकपना है, परंतु सब जुदे-जुदे हैं, और पुरुष – जातिकर सबकी एकता है, परंतु
सब अलग अलग हैं । उसी प्रकार जीव – जातिकी अपेक्षासे सब जीवोंका एकपना है, तो