Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 106 (Adhikar 2).

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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-106
जीव कतिसंख्योपेतान् सयल वि समस्तानपि कथंभूतान्न मन्यते एक्क-सहाव वीतराग-
निविकल्पसमाधौ स्थित्वा सकलविमलकेवलज्ञानादिगुणैर्निश्चयेनैकस्वभावान् तासु ण थक्कइ भाउ
समु तस्य न तिष्ठति समभावः कथंभूतः भव-सायरि जो णाव संसारसमुद्रे यो
नावस्तरणोपायभूता नौरिति अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा रागद्वेषमोहान् मुक्त्वा च परमोपशमभावरूपे
शुद्धात्मनि स्थातव्यमित्यभिप्रायः ।।१०५।।
अथ जीवानां योऽसौ भेदः स कर्मकृत इति प्रकाशयति
२३३) जीवहँ भेउ जि कम्म-किउ कम्मु वि जीउ ण होइ
जेण विभिण्णउ होइ तहँ कालु लहेविणु कोइ ।।१०६।।
जीवानां भेद एव कर्मकृतः कर्म अपि जीवो न भवति
येन विभिन्नः भवति तेभ्यः कालं लब्ध्वा कमपि ।।१०६।।
nayathI sakaL vimaL kevaLagnAnAdi guNo vaDe ekasvabhAvI nathI mAnato tene sansArasamudrane taravAnA
upAyabhUt evo samabhAv hoto nathI ke je samabhAv sansArasamudrane taravAnA sAdhanarUp nAv chhe.
ahIn, A vyAkhyAn jANIne ane rAg-dveSh-mohane chhoDIne paramopashamabhAvarUp shuddha
AtmAmAn sthit thavun, evo abhiprAy chhe. 105.
have, jIvonA je kAI bhed chhe te karmakRut chhe, em pragaT kare chhe
निर्विकल्पसमाधिमें स्थित होकर सबको समान दृष्टिसे नहीं देखता, सकल ज्ञायक परम निर्मल
केवलज्ञानादि गुणोंकर निश्चयनयसे सब जीव एकसे हैं, ऐसी जिसके श्रद्धा नहीं है, उसके
समभाव नहीं उत्पन्न हो सकता
ऐसा निस्संदेह जानो कैसा है समभाव, जो संसार समुद्रसे
तारनेके लिये जहाजके समान है यहाँ ऐसा व्याख्यान जानकर राग-द्वेष-मोहको तजकर
परमशांतभावरूप शुद्धात्मामें लीन होना योग्य है ।।१०५।।
आगे जीवोंमें जो भेद हैं, वह सब कर्मजनित हैं, ऐसा प्रगट करते हैं
गाथा१०६
अन्वयार्थ :[जीवानां ] जीवोंमें [भेदः ] नर-नारकादि भेद [कर्मकृत एव ] कर्मोंसे
ही किया गया है, और [कर्म अपि ] कर्म भी [जीवः ] जीव [न भवति ] नहीं हो सकता
[येन ] क्योंकि वह जीव [कमपि ] किसी [कालं ] समयको [लब्ध्वा ] पाकर [तेभ्यः ] उन
कर्मोंसे [विभिन्नः ] जुदा [भवति ] हो जाता है