Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration).

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adhikAr-2 dohA-127 ]paramAtmaprakAsha [ 427
Avun kathan sAmbhaLIne koI agnAnI pUchhe chhe ke prAN jIvathI abhinna chhe ke bhinna
chhe? jo abhinna hoy to jem jIvano vinAsh nathI tem prANano paN vinAsh na thAy.
(ane prANano vinAsh na thavAthI hinsA banI shake nahi). have jo prAN (jIvathI) bhinna
hoy to prANano vadh thatAn paN, jIvano vadh thashe nahi (ane tem thavAthI hinsA banI shake
nahi). e rIte A bemAnthI koI paN prakAre jIvanI hinsA ja nathI to pachhI jIvahinsAmAn
pApabandh kevI rIte thAy?
tenun samAdhAAn :prAN jIvathI kathanchit bhinna ane kathanchit abhinna chhe. te A
pramANepotAno prAN haNAtAn, potAne dukh thAy chhe em jovAmAn Ave chhe tethI (e
apekShAe) vyavahAranayathI deh ane AtmA abhed chhe ane te ja dukhotpattine hinsA
kahevAmAn Ave chhe ane tethI pApano bandh thAy chhe. vaLI, jo ekAnte deh ane AtmAno
kevaL bhed ja mAnavAmAn Ave to jevI rIte paranA dehano ghAt thatAn paN dukh na thAy
समीपे दर्शितौ जहिं रुच्चइ तहिं लग्गु हे जीव यत्र रोचते तत्र लग्न भव त्वमिति
कश्चिदज्ञानी प्राह प्राणा जीवादभिन्ना भिन्नावा, यद्यभिन्नाः तर्हि जीववत्प्राणानां विनाशो
नास्ति, अथ भिन्नास्तर्हि प्राणवधेऽपि जीवस्य वधो नास्त्यनेन प्रकारेण जीवहिंसैव नास्ति कथं
जीववधे पापबन्धो भविष्यतीति
परिहारमाह कथंचिद्- भेदाभेदः तथाहिस्वकीयप्राणे हृते
सति दुःखोत्पत्तिदर्शनाद्वयवहारेणाभेदः सैव दुःखोत्पत्तिस्तु हिंसा भण्यते ततश्च पापबन्धः
यदि पुनरेकान्तेन देहात्मनोर्भेद एव तर्हि यथा परकीयदेहघाते दुःखं न भवति तथा
स्वदेहघातेऽपि दुःखं न स्यान्न च तथा
निश्चयेन पुनर्जीवे गतेऽपि देहो न गच्छतीति हेतोर्भेद
परदयास्वरूप अभयदान है, उसके करनेवालोंको स्वर्ग मोक्ष होता है, इसमें संदेह नहीं है
इनमें से जो अच्छा मालूम पड़े उसे करो ऐसी श्रीगुरुने आज्ञा की ऐसा कथन सुनकर
कोई अज्ञानी जीव तर्क करता है, कि जो ये प्राण जीवसे जुदे हैं, कि नहीं ? यदि जीवसे
जुदे नहीं हैं, तो जैसे जीवका नाश नहीं है, वैसे प्राणोंका भी नाश नहीं हो सकता ? अगर
जुदे हैं, अर्थात् जीवसे सर्वथा भिन्न हैं, तो इन प्राणोंका नाश नहीं हो सकता
इसप्रकारसे
जीवहिंसा है ही नहीं, तुम जीवहिंसामें पाप क्यों मानते हो ? इसका समाधानजो ये
इन्द्रिय, बल, आयु, श्वासोच्छ्वास और प्राण जीवसे किसी नयकर अभिन्न हैं, भिन्न नहीं
हैं, किसी नयसे भिन्न हैं
ये दोनों नय प्रामाणिक हैं अब अभेद कहते हैं, सो सुनो
अपने प्राणोंका घात होने पर जो व्यवहारनयकर दुःखकी उत्पत्ति वह हिंसा है, उसीसे पापका
बंध होता है
और जो इन प्राणोंको सर्वथा जुदे ही मानें, देह और आत्माका सर्वथा भेद
ही जानें, तो जैसे परके शरीरका घात होने पर दुःख नहीं होता है, वैसे अपने देहके घातमें