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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-133
shrAvakadharmanun AcharaN na karyun ane tapodhane bAhya samasta dravyonI ichchhAno nirodh karIne
anashanAdi bAr prakAranA tapashcharaNanA baLathI nijashuddhAtmAnA dhyAnamAn sthit thaIne nirantar
AtmabhAvanA na karI-e rIte je gRuhasthe ke tapodhane na karyun, tenun sharIr jarArUp UdhaIthI khavAI
jashe, ane narakamAn paDavun paDashe.
ahIn, tAtparya em chhe ke gRuhasthe abhedaratnatrayasvarUpane upAdey karIne bhedaratnatrayAtmak
shrAvakadharma pALavo ane yatie nishchayaratnatrayamAn sthit thaIne vyAvahArik ratnatrayanA baLathI
vishiShTa tapashcharaN karavun joIe, nahitar (shrAvakano ke yatino dharma na pALyo to) paramparAe
pAmelo durlabh evo manuShyajanma niShphaL chhe. 133.
have, he jIv! jineshvarapadanI param bhakti kar evI shrI gurudev shikShA Ape chhe —
द्वादशविधतपश्चरणबलेन निजशुद्धात्मध्याने स्थित्वा निरन्तरं भावना न कृता । के न कृत्वा । रुक्खें
चम्ममएण वृक्षेण मनुष्यशरीरचर्मनिर्वृत्तेन । येनैवं न कृतं गृहस्थेन तपोधनेन वा णरइ पडिव्वउ
तेण नरके पतितव्यं तेन । किं कृत्वा । खज्जिवि भक्षयित्वा । कया कर्तृभूतया । जरउद्देहियए
जरोद्रेहिकया । इदमत्र तात्पर्यम् । गृहस्थेनाभेदरत्नत्रयस्वरूपमुपादेयं कृत्वा भेदरत्नत्रयात्मकः
श्रावकधर्मः कर्तव्यः, यतिना तु निश्चयरत्नत्रये स्थित्वा व्यावहारिकरत्नत्रयबलेन विशिष्टतपश्चरणं
कर्तव्यं नो चेत् दुर्लभपरंपरया प्राप्तं मनुष्यजन्म निष्फलमिति ।।१३३।।
अथ हे जीव जिनेश्वरपदे परमभक्तिं कुर्विति शिक्षां ददाति —
२६४) अरि जिय जिण-पइ भत्ति करि सुहि सज्जणु अवहेरि ।
तिं बप्पेण वि कज्जु णवि जो पाडइ संसारि ।।१३४।।
बारह प्रकारका तप नहीं किया, तपश्चरणके बलसे शुद्धात्माके ध्यानमें ठहरकर निरंतर भावना
नहीं की, मनुष्यके शरीररूप चर्ममयी वृक्षको पाकर यतीका व श्रावकका धर्म नहीं किया,
उनका शरीर वृद्धावस्थारूपी दीमकके कीड़े खावेंगे, फि र वह नरकमें जावेगा । इसलिये
गृहस्थको तो यह योग्य है, कि निश्चयरत्नत्रयकी श्रद्धाकर निजस्वरूप उपादेय जान, व्यवहार
रत्नत्रयरूप श्रावकका धर्म पालना । और यतीको यह योग्य है, कि निश्चयरत्नत्रयमें ठहरकर
व्यवहाररत्नत्रयके बलसे महा तप करना । अगर यतीका व श्रावकका धर्म नहीं बना, अणुव्रत
नहीं पाले, तो महा दुर्लभ मनुष्य – देहका पाना निष्फल है, उससे कुछ फायदा नहीं ।।१३३।।
आगे श्रीगुरु शिष्यको यह शिक्षा देते हैं, कि तू मुनिराजके चरणारविंदकी परमभक्ति
कर,