Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 481 of 565
PDF/HTML Page 495 of 579

 

background image
adhikAr-2 dohA-162 ]paramAtmaprakAsha [ 481
तिष्ठति इति यत्र यदायं जीवो रागादिपरभावशून्यनिर्विकल्पसमाधौ तिष्ठति
तदायमुच्छ्वासरूपो वायुर्नासिकाछिद्रद्वयं वर्जयित्वा स्वयमेवानीहितवृत्त्या तालुप्रदेशे यत् केशात्
शेषाष्टमभागप्रमाणं छिद्रं तिष्ठति तेन क्षणमात्रं दशमद्वारेण तदनन्तरं क्षणमात्रं नासिकया
तदनन्तरं रन्ध्रेण कृत्वा निर्गच्छतीति
न च परकल्पितवायुधारणारूपेण श्वासनाशो ग्राह्यः
कस्मादिति चेत् वायुधारणा तावदीहापूर्विका, ईहा च मोहकार्यरूपो विकल्पः स च
ahIn, jyAre A jIv rAgAdi parabhAvathI shUnya nirvikalpa samAdhimAn rahe chhe tyAre
uchchhvAsarUp vAyu nAkanA banne chhidrone chhoDIne svayamev anIhitavRuttithI tAlupradeshamAn vALanI
aNInA AThamA bhAg jevaDun je chhidra chhe te dasham dvArathI kShaNavAr, tyAr pachhI kShaNavAr
nAsikAthI, tyAr pachhI brahmarandhra dvArathI nIkaLe chhe paN parakalpit (pAtanjali matavALAthI
kalpit) vAyudhAraNarUpe shvAsano nAsh na samajavo (shvAsanun rundhan na samajavun). shA mATe? kAraN
ke vAyudhAraNA pratham to ihApUrvak chhe ane ihA mohanA kAryarUp vikalpa chhe. vaLI, te
(anIhitavRuttithI nirvikalpasamAdhinA baLathI nIkaLato vAyu) mohanun kAraN thato nathI, tethI
ahIn parakalpit vAyu ghaTato nathI. vaLI kumbhak, pUrak, rechak Adi jenI sangnA chhe te vAyudhAraNA
ahIn kShaNavAr ja thAy chhe paN abhyAsanA vashe ghaDI, prahar, divas Adi sudhI paN thAy chhe
अर्थात् निजस्वभावमें मनकी चंचलता नहीं रहती जब यह जीव रागादि परभावोंसे शून्य
निर्विकल्पसमाधिमें होता है, तब यह श्वासोच्छ्वासरूप पवन नासिकाके दोनों छिद्रोंको छोड़कर
स्वयमेव अवाँछीक वृत्तिसे तालुवाके बालकी अनीके आठवें भाग प्रमाण अत सूक्ष्म छिद्रमें
(दशवें द्वारमें) होकर निकलती है, नासाके छेदको छोड़कर तालुरंध्रमें (छेदमें) होकर
निकलती है
और पातंजलिमतवाले वायुधारणारूप श्वासोच्छ्वास मानते हैं, वह ठीक नहीं हैं,
क्योंकि वायुधारणा वाँछापूर्वक होती है, और वाँछा है, वह मोहसे उत्पन्न विकल्परूप है,
वाँछाका कारण मोह है
वह संयमीको वायुका निरोध वाँछापूर्वक नहीं होता है, स्वाभाविक
ही होता है जिनशासनमें ऐसा कहा है, कि कुंभक (पवनको खेंचना) पूरक (पवनको
थाँभना) रेचक (पवनको निकालना) ये तीन भेद प्राणायामके हैं, इसीको वायुधारणा कहते
हैं यह क्षणमात्र होती है, परंतु अभ्यासके वशसे घड़ी, पहर, दिवस आदि तक भी होती है
उस वायुधारणाका फल ऐसा कहा है, कि देह आरोग्य होती है, देहके सब रोग मिट जाते हैं,
शरीर हलका हो जाता है, परंतु मुक्ति इस वायुधारणासे नहीं होती, क्योंकि वायुधारणा शरीरका
धर्म है, आत्माका स्वभाव नहीं है
शुद्धोपयोगियोंके सहज ही बिना यत्नके मन भी रुक जाता
है, और श्वास भी स्थिर हो जाते हैं शुभोपयोगियोंके मनके रोकनेके लिये प्राणायामका अभ्यास
है, मनके अचल होनेपर कुछ प्रयोजन नहीं है जो आत्मस्वरूप है, वह केवल चेतनामयी ज्ञान