Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 169 (Adhikar 2) Chinta Rahit Dhyan Mukatinu Karan.

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adhikAr-2 dohA-169 ]paramAtmaprakAsha [ 493
अथ निश्चयेन चिन्तारहितध्यानमेव मुक्ति कारणमिति प्रतिपादयति चतुष्कलेन
३००) अद्धुम्मीलिय-लोयणिहिँ जोउ कि झंपियएहिँ
एमुइ लव्भइ परम-गइ णिच्चिंतिं ठियएहिँ ।।१६९।।
अर्धोन्मीलितलोचनाभ्यां योगः किं झंपिताभ्याम्
एवमेव लभ्यते परमगतिः निश्चिन्तं स्थितैः ।।१६९।।
अद्धुम्मीलिय-लोयणिहिं अर्धोन्मीलितलोचनपुटाभ्यां जोउ किं योगो ध्यानं किं भवति
अपि तु नैव न केवलमर्धोन्मीलिताभ्याम् झंपियएहिं झंपिताभ्यामपि लोचनाभ्यां नैवेति
तर्हि कथं लभ्यते एमुइ लब्भइ एवमेव लभ्यते लोचनपुटनिमीलनोन्मीलननिरपेक्षैः का
लभ्यते परम-गइ केवल ज्ञानादिपरमगुणयोगात्परमगतिर्मोक्षगतिः कैः लभ्यते णिच्चिंतिं
ठियएहिं ख्यातिपूजालाभप्रभृतिसमस्तचिन्ताजालरहितैः पुरुषैश्चिन्तारहितैः स्वशुद्धात्मरूप-
स्थितैश्चत्यभिप्रायः
।।१६९।।
अथ
have nishchayathI chintA rahit dhyAn ja muktinun kAraN chhe, em chAr gAthAsUtrothI kahe
chhe
have, pharI paN chintAno ja tyAg karavAnun kahe chhe
आगे निश्चयसे चिन्ता रहित ध्यान ही मुक्तिका कारण है, ऐसा कहते हैं
गाथा१६९
अन्वयार्थ :[अर्धोन्मीलितलोचनाभ्यां ] आधे ऊ घड़े हुए नेत्रोंसे अथवा
[झंपिताभ्याम् ] बंद हुए नेत्रोंसे [किं ] क्या [योगः ] ध्यानकी सिद्धि होती है, कभी नहीं
[निश्चिन्तं स्थितैः ] जो चिन्ता रहित एकाग्रमें स्थित हैं, उनको [एवमेव ] इसी तरह [लभ्यते
परमगतिः ] स्वयमेव परमगति (मोक्ष) मिलती है
।।
भावार्थ :ख्याति (बड़ाई) पूजा (अपनी प्रतिष्ठा) और लाभ इनको आदि लेकर
समस्त चिन्ताओंसे रहित जो निश्चिंत पुरुष हैं, वे ही शुद्धात्मस्वरूपमें स्थिरता पाते हैं, उन्हींके
ध्यानकी सिद्धि है, और वे ही परमगतिके पात्र हैं
।।१६९।।
आगे फि र भी चिन्ताका ही त्याग बतलाते हैं