Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 187 (Adhikar 2) Bathi Chintaono Nishedh.

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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-187
तथापि क्षमितव्यम्, अथवा प्राणविनाशमेव करोति न च भेदाभेदरत्नत्रयभावनाविनाशं चेति
मत्वा सर्वतात्पर्येण क्षमा कर्तव्येत्यभिप्रायः
।।१८६।।
अथ सर्वचिन्तां निषेधयति युग्मेन
३१८) जोइय चिंति म किं पि तुहुँ जइ बीहउ दुक्खस्स
तिल-तुस-मित्तु वि सल्लडा वेयण करइ अवस्स ।।१८७।।
योगिन् चिन्तय मा किमपि त्वं यदि भीतः दुःखस्य
तिलतुषमात्रमपि शल्यं वेदनां करोत्यवश्यम् ।।१८७।।
चिंति म चिन्तां मा कार्षीः किं पि तुहुं कामपि त्वं जोइय हे योगिन् यदि किम्
जइ बीहउ यदि बिभेषि कस्य दुक्खस्स वीतरागतात्त्विकानन्दैकरूपात् पारमार्थिक-
paN bhedAbhed ratnatray bhAvanAno vinAsh karato nathI em mAnIne sarva tAtparyathI kShamA
karavI joIe, e abhiprAy chhe. 186.
have, be gAthAsUtro dvArA sarva chintAono niShedh kare chhe
bhAvArthahe yogI! tun jo vItarAg tAttvik Anandamay jenun ekarUp chhe evA
pAramArthik sukhathI pratipakShabhUt nArakAdi dukhathI Darato ho to viShayakaShAyanI lesh mAtra paN
भेदाभेदरत्नत्रयकी भावनाका विनाश नहीं किया ऐसा जानकर सर्वथा क्षमा ही करना
चाहिये ।।१८६।।
आगे सब चिन्ताओंका निषेध करते हैं
गाथा१८७
अन्वयार्थ :[योगिन् ] हे योगी, [त्वं ] तू [यदि ] जो [दुःखस्य ] वीतराग परम
आनंदके शत्रु जो नरकादि चारों गतियोंके दुःख उनसे [भीतः ] डर गया है, तो तू निश्चिंत
होकर परलोकका साधन कर, इस लोककी [किमपि मा चिंतय ] कुछ भी चिंता मत कर
क्योंकि [तिलतुषमात्रमपि शल्यं ] तिलके भूसे मात्र भी शल्य [वेदनां ] मनको वेदना
[अवश्यम् करोति ] निश्चयसे करती है
भावार्थ :चिन्ता रहित आत्मज्ञानसे उलटे जो विषय कषाय आदि विकल्पजाल
उनकी चिन्ता कुछ भी नहीं करना यह चिन्ता दुःखका ही कारण है, जैसे बाण आदिकी