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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-206
अण्णु वि इत्यादि । अण्णु वि अन्यदपि विशेषफलं कथ्यते । भत्तिए जे मुणहिं भक्त्या
ये मन्यन्ते जानन्ति । कम् । इहु परमप्पपयासु इमं प्रत्यक्षीभूतं परमात्मप्रकाशग्रन्थमर्थतस्तु
परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यं परमात्मतत्त्वं पावहिं प्राप्नुवन्ति ते वि तेऽपि । कम् । पयासु
प्रकाशशब्दवाच्यं केवलज्ञानं तदाधारपरमात्मानं वा । कथंभूतं परमात्मप्रकाशम् । लोयालोय-
पयासयरु अनन्तगुणपर्यायसहितत्रिकालविषयलोकालोकप्रकाशकमिति तात्पर्यम् ।।२०५।।
अथ —
३३७) जे परमप्प – पयासयहं अणुदिणु णाउ लयंति ।
तुट्टइ मोहु तडत्ति तहँ तिहुयण-णाह हवंति ।।२०६।।
ये परमात्मप्रकाशस्य अनुदिनं नामं गृह्णन्ति ।
त्रुटयति मोहः झटिति तेषां त्रिभुवननाथा भवन्ति ।।२०६।।
भक्तिसे [इमं परमात्मप्रकाशम् ] इस परमात्मप्रकाश शास्त्रको [जानन्ति ] पढ़ें, सुनें, इसका
अर्थ जानें, [तेऽपि ] वे भी [लोकालोकप्रकाशकरं ] लोकालोकको प्रकाशनेवाले [प्रकाशम् ]
केवलज्ञान तथा उसके आधारभूत परमात्मतत्त्वको शीघ्र ही पा सकेंगे । अर्थात् परमात्मप्रकाश
नाम परमात्मतत्त्वका भी है, और इस ग्रंथका भी है, सो परमात्मप्रकाश ग्रंथके पढ़नेवाले दोनों
ही को पावेंगे । प्रकाश ऐसा केवलज्ञानका नाम है, उसका आधार जो शुद्ध परमात्मा अनंत
गुण पर्याय सहित तीनकालका जाननेवाला लोकालोकका प्रकाशक ऐसा आत्मद्रव्य उसे तुरंत
ही पावेंगे ।।२०५।।
आगे फि र भी परमात्मप्रकाशके पढ़नेका फल कहते हैं —
गाथा – २०६
अन्वयार्थ : — [ये ] जो कोई भव्यजीव [परमात्मप्रकाशकस्य ] व्यवहारनयसे
परमात्माके प्रकाश करनेवाले इस ग्रंथका तथा निश्चयनयसे केवलज्ञानादि अनंतगुण सहित
bhAvArtha — vaLI bIjun visheSh phaL kahe chhe ke jeo A pratyakSha paramAtmaprakAsh granthane
arthathI paN paramAtmashabdathI vAchya evA paramAtmatattvane bhaktithI jANe chhe teo anant-
guNaparyAyasahit traNakALanA lokAlokanA prakAshak, prakAsh shabdathI vAchya evA kevaLagnAn tathA
temanA AdhArabhUt paramAtmaprakAshane – paramAtmatattvane pAme chhe, e tAtparya chhe. 205.
vaLI (have pharI paramAtmaprakAshanA abhyAsanun phaL kahe chhe) —