Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (itrans transliteration). Gatha-79 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
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adhikAr-1 : dohA-79 ]paramAtmaprakAsh: [ 135
अनंत गुणोंसे बुद्धिमान चतुर है, तो भी इस जीवको वे संसारके कारण कर्म ज्ञानादि गुणोंका
आच्छादन करके अभेदरत्नत्रयरूप निश्चयमोक्षमार्गसे विपरीत खोटे मार्गमें डालते हैं, अर्थात्
मोक्ष-मार्गसे भुलाकर भव-वनमें भटकाते हैं
यहाँ यह अभिप्राय है, कि संसारके कारण जो
कर्म और उनके कारण मिथ्यात्व रागादि परिणाम हैं, वे सब हेय हैं, तथा अभेदरत्नत्रयरूप
निश्चयमोक्षमार्ग है, वह उपादेय है
।।७८।।
आगे मिथ्यात्व परिणतिसे यह जीव तत्त्वको यथार्थ नहीं जानता, विपरीत जानता है, ऐसा
कहते हैं
गाथा७९
अन्वयार्थ :[जीवः ] यह जीव [मिथ्यात्वेन परिणतः ] अतत्त्वश्रद्धानरूप परिणत
हुआ, [तत्त्वं ] आत्माको आदि लेकर तत्त्वोंके स्वरूपको [विपरीतं ] अन्यका अन्य [मनुते ]
श्रद्धान करता है, यथार्थ नहीं जानता
वस्तुका स्वरूप तो जैसा है वैसा ही है, तो भी वह
bhAvArtha:ahI.n A abhedaratnatrayarUp nishchayamokShamArga ja upAdey Che, evo
abhiprAy Che. 78.
have, mithyA pariNatithI jIv viparIt tattvane jANe Che, em kahe Che :
वज्रसमान्यभेद्यानि च इत्थंभूतानि कर्माणि किं कुर्वन्ति णाणवियक्खणु जिवडउ उप्पहि
पाडहिं ताइं ज्ञानविचक्षणं जीवमुत्पथे पातयन्ति तानि कर्माणि युगपल्लोकालोकप्रकाशककेवल-
ज्ञानाद्यनन्तगुणविचक्षणं दक्षं जीवमभेदरत्नत्रयलक्षणान्निश्चयमोक्षमार्गात्प्रतिपक्षभूत उन्मार्गे
पातयन्तीति
अत्रायमेवाभेदरत्नत्रयरूपो निश्चयमोक्षमार्ग उपादेय इत्यभिप्रायः ।।७८।।
अथ मिथ्यापरिणत्या जीवो विपरीतं तत्त्वं जानातीति निरूपयति
७९) जिउ मिच्छत्तेँ परिणमिउ विवरिउ तच्चु मुणेई
कम्म-विणिम्मिय भावडा ते अप्पाणु भणेइ ।।७९।।
जीवः मिथ्यात्वेन परिणतः विपरीतं तत्त्वं मनुते
कर्मविनिर्मितान् भावान् तान् आत्मानं भणति ।।७९।।
जिउ मिच्छत्तें परिणमिउ विवरिउ तच्चु मुणेइ जीवो मिथ्यात्वेन परिणतः सन् विपरीतं
तत्त्वं जानाति, शुद्धात्मानुभूतिरुचिविलक्षणेन मिथ्यात्वेन परिणतः सन् जीवः परमात्मादितत्त्वं
च यथावद् वस्तुस्वरूपमपि विपरीतं मिथ्यात्वरागादिपरिणतं जानाति
ततश्च किं करोति