Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
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166 ]yogIndudevavirachit: [ adhikAr-1 : dohA-100
अथैतदेव समर्थयति —
१००) अप्प – सहावि परिट्ठियह एहउ होइ विसेसु ।
दीसइ अप्प – सहावि लहु लोयालोउ असेसु ।।१००।।
आत्मस्वभावे प्रतिष्ठितानां एष भवति विशेषः ।
द्रश्यते आत्मस्वभावे लघु लोकालोकः अशेषः ।।१००।।
अप्पसहावि परिट्ठियहं आत्मस्वभावे प्रतिष्ठितानां पुरुषाणां, एहउ होइ विसेसु एष
प्रत्यक्षीभूतो विशेषो भवति । एष कः । दीसइ अप्पसहावि लहु द्रश्यते परमात्मस्वभावे
स्थितानां लघु शीघ्रम् । अथवा पाठान्तरं ‘दीसइ अप्पसहाउ लहु’ ।द्रश्यते, स कः,
अन्यभाव जो नर नारकादि पर्याय उनसे रहित है, विशेष अर्थात् गुणस्थान मार्गणा जीवसमास
इत्यादि सब भेदोंसे रहित है । ऐसे आत्माके स्वरूपको जो देखता है, जानता है, अनुभवता
है, वह सब जिनशासनका मर्म जाननेवाला है ।।९९।।
अब इसी बातका समर्थन (दृढ़) करते हैं —
गाथा – १००
अन्वयार्थ : — [आत्मस्वभावे ] आत्माके स्वभावमें [प्रतिष्ठितानां ] लीन हुए
पुरुषोंके [एष विशेषः भवति ] प्रत्यक्षमें जो यह विशेषता होती है, कि [आत्मस्वभावे ]
आत्मस्वभावमें उनको [अशेषः लोकालोकः ] समस्त लोकालोक [लघु ] शीघ्र ही
[दृश्यते ] दिख जाता है ।
भावार्थ : — अथवा इस जगह ऐसा भी पाठांतर है, ‘‘अप्पसहाव लहु’’ इसका अर्थ
abhya.ntar j~nAnarUp bhAvashrutavALu.n Che. 99.
have, A vAtanu.n ja samarthan kare Che : —
bhAvArtha: — ahI.n visheShapaNe pUrva sUtramA.n kahelA.n chArey vyAkhyAn jANavA, kAraN ke te
vyAkhyAn pramANe vR^iddha AchAryonI sAkShI paN maLI Ave Che.
(kAraN ke te vyAkhyAnano, vR^iddha AchAryonA matanI sAthe paN meL khAy Che.) 100.
have, A ja arthane draShTA.nt drArShTA.ntathI draDh kare Che : —