Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (itrans transliteration). Gatha-105 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
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adhikAr-1 : dohA-105 ]paramAtmaprakAsh: [ 171
णाणु पयासहि परमु महु ज्ञानं प्रकाशय परमं मम किं अण्णे बहुएण किमन्येन
ज्ञानरहितेन बहुना जेण णियप्पा जाणियइ येन ज्ञानेन निजात्मा ज्ञायते, सामिय एक्कखणेण
हे स्वामिन् नियतकालेनैकक्षणेनेति तथाहि प्रभाकरभट्टः पृच्छति किं पृच्छति हे भगवन्
येन वीतरागस्वसंवेदनज्ञानेन क्षणमात्रेणैव शुद्धबुद्धैकस्वभावो निजात्मा ज्ञायते तदेव ज्ञानं
कथय किमन्येन रागादिप्रवर्धकेन विकल्पजालेनेति
अत्र येनैव ज्ञानेन मिथ्यात्वरागादि-
विकल्परहितेन निजशुद्धात्मसंवित्तिरूपेणान्तर्मुहूर्तेनैव परमात्मस्वरूपं ज्ञायते तदेवोपादेयमिति
तात्पर्यार्थः
।।१०४।।
अत उर्ध्वं सूत्रचतुष्टयेन ज्ञानस्वरूपं प्रकाशयति
१०५) अप्पा णाणु मुणेहि तुहुँ जो जाणइ अप्पाणु
जीवपएसहिँ तित्तिडउ णाणेँ गयणपवाणु ।।१०५।।
आत्मानं ज्ञानं मन्यस्व त्वं यः जानाति आत्मानम्
जीवप्रदेशैः तावन्मात्रं ज्ञानेन गगनप्रमाणम् ।।१०५।।
भावार्थ :प्रभाकर भट्ट श्रीयोगीन्द्रदेवसे पूछता है, कि हे स्वामी जिस
वीतरागस्वसंवेदनकर ज्ञानकर क्षणमात्रमें शुद्ध, बुद्ध स्वभाव अपनी आत्मा जानी जाती है, वह
ज्ञान मुझको प्रकाशित करो, दूसरे विकल्प-जालोंसे कुछ फ ायदा नहीं है, क्योंकि ये रागादिक
विभावोंके बढ़ानेवाले हैं
सारांश यह है कि मिथ्यात्व रागादि विकल्पोंसे रहित तथा निज शुद्ध
आत्मानुभवरूप जिस ज्ञानसे अंतर्मुहूर्तमें ही परमात्माका स्वरूप जाना जाता है, वही ज्ञान उपादेय
है
ऐसी प्रार्थना शिष्यने श्रीगुरुसे की ।।१०४।।
आगे श्रीगुरु चार दोहा-सूत्रोंसे ज्ञानका स्वरूप प्रकाशते हैंश्रीगुरु कहते हैं, कि
गाथा१०५
हे प्रभाकर भट्ट, [त्वं ] तू [आत्मानं ] आत्माको ही [ज्ञानं ] ज्ञान [मन्यस्व ] जान,
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svasa.nvedanarUp j~nAnathI kShaNamAtramA.n ja shuddha, buddha jeno ek svabhAv Che evo nij AtmA jaNAy
Che te ja j~nAnano upadesh karo, anya rAgAdivardhak vikalpajALathI shu.n prayojan Che?
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paramAtmAnu.n svarUp jaNAy Che te ja j~nAn upAdey Che, evo tAtparyArtha Che. 104.
tyAr paChI chAr gAthA sUtrothI shrI guru j~nAnanu.n svarUp prakAshe Che.