Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
adhikAr-1 : dohA-107 ]paramAtmaprakAsh: [ 175
कस्मात् । णाणु वियाणइ जेण ज्ञानं कर्तृ विजानात्यात्मानं येन कारणेन अतः कारणात् तिण्णि
वि मिल्लिवि जाणि तुहुं त्रीण्यपि मुक्त्वा जानीहि त्वं हे प्रभाकरभट्ट, अप्पा णाणें तेण । कं
जानीहि । आत्मानम् । केन । ज्ञानेन तेन कारणेनेति । तथाहि । निजशुद्धात्मा ज्ञानस्यैव गम्यः ।
कस्मादिति चेत् । मतिज्ञानादिकपञ्चविकल्परहितं यत्परमपदं परमात्मशब्दवाच्यं साक्षान्मोक्षकारणं
तद्रूपो योऽसौ परमात्मा तमात्मानं वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानगुणेन विना दुर्धरानुष्ठानं
कुर्वाणाअपि बहवोऽपि न लभन्ते यतः कारणात् । तथा चोक्तं समयसारे — ‘‘णाणगुणेण
विहीणा एयं तु पयं बहू वि ण लहंते । तं गिण्ह णियदमेदं जदि इच्छसि दुक्खपरिमोक्खं ।।’’ ।
अत्र धर्मार्थकामादिसर्वपरद्रव्येच्छां योऽसौ मुञ्चति स्वशुद्धात्मसुखामृते तृप्तो भवति स एव
निःपरिग्रहो भण्यते स एवात्मानं जानातीति भावार्थः । उक्तं च — ‘‘अपरिग्गहो अणिच्छो
पाँच भेदों रहित जो परमात्म शब्दका अर्थ परमपद है वही साक्षात् मोक्षका कारण है, उस
स्वरूप परमात्माको वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदन ज्ञानके बिना दुर्धर तपके करनेवाले भी बहुतसे
प्राणी नहीं पाते । इसलिये ज्ञानसे ही अपना स्वरूप अनुभव कर । ऐसा ही कथन
श्रीकुंदकुंदाचार्यने समयसारजीमें किया है ‘‘णाणगुणेहिं’’ इत्यादि । इसका अर्थ यह है, कि
सम्यग्ज्ञाननामा निज गुणसे रहित पुरुष इस ब्रह्मपदको बहुत कष्ट करके भी नहीं पाते, अर्थात्
जो महान दुर्धर तप करो तो भी नहीं मिलता । इसलिये जो तू दुःखसे छूटना चाहता है,
सिद्धपदकी इच्छा रखता है, तो आत्मज्ञानकर निजपदको प्राप्त कर । यहाँ सारांश यह है कि,
जो धर्म-अर्थ-कामादि सब परद्रव्यकी इच्छाको छोड़ता है, वही निज शुद्धात्मसुखरूप अमृतमें
तृप्त हुआ सिद्धांतमें परिग्रह रहित कहा जाता है, और निर्ग्रंथ कहा जाता है, और वही अपने
आत्माको जानता है । ऐसा ही समयसारमें कहा है ‘‘अपरिग्गहो’’ इत्यादि । इसका अर्थ ऐसा
‘paramAtma’ shabdathI vAchya je paramapad sAkShAt mokShanu.n kAraN Che, tadrUp je paramAtmA Che te AtmAne
vItarAg nirvikalpa svasa.nvedanarUp j~nAnaguN vinA durdhar anuShThAn karavA ChatA.n paN ghaNA puruSho
pAmatA nathI. shrI samayasAr (gAthA 205)mA.n kahyu.n paN Che ke
‘‘णाणगुणेण विहीणा एयं तु पयं बहू वि ण लहंते । तं गिण्ह णियदमेदं जदि इच्छसि
कम्मपरिमोक्खं ।। [artha: — j~nAnaguNathI rahit ghaNAy loko (ghaNA prakAranA.n karma karavA ChatA.n) A
j~nAnasvarUp padane pAmatA nathI; mATe he bhavya! jo tu.n karmathI sarvathA mukta thavA ichChato ho
to A niyat evA Ane (j~nAnane) grahaN kar.]
ahI.n dharma, artha, kAmAdi sarva paradravyanI ichChAne je ChoDe Che ane svashuddhAtmasukhAmR^itamA.n
tR^ipta thAy Che te ja niHparigrahI kahevAmA.n Ave Che, te ja potAnA AtmAne jANe Che, evo
bhAvArtha Che. (shrI samayasAr gAthA 210mA.n) kahyu.n paN Che ke – ‘‘अपरिग्गहो अणिच्छो भणिदो णाणि