Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
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184 ]yogIndudevavirachit: [ adhikAr-1 : dohA-114
पुद्गलादिपञ्चभेदं यत्सर्वं तद्धेयमिति ।।११३।।
अथ वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरन्तर्मुहूर्तेनापि कर्मजालं दहतीति ध्यानसामर्थ्यं दर्शयति —
११४) जइ णिविसद्धु वि कु वि करइ परमप्पइ अणुराउ ।
अग्गि-कणी जिम कट्ठ-गिरि डहइ असेसु वि पाउ ।।११४।।
यदि निमिषार्धमपि कोऽपि करोति परमात्मनि अनुरागम् ।
अग्निकणिका यथा काष्ठगिरिं दहति अशेषमपि पापम् ।।११४।।
जइ इत्यादि । जइ णिविसद्धु वि यदि निमिषार्घमपि कु वि करइ कोऽपि कश्चित्
करोति । किं करोति । परमप्पइ अणुराउ परमात्मन्यनुरागम् । तदा किं करोति । अग्गिकणी जिम
कर्म, और शरीरादिक नोकर्म, और इनका संबंध अनादिसे है, परंतु जीवसे भिन्न है, इसलिये
अपने मत मान । पुद्गलादि पाँच भेद जड़ पदार्थ सब हेय जान, अपना स्वरूप ही उपादेय
है, उसीको आराधन कर ।।११३।।
आगे एक अन्तमुहूर्तमें कर्म-जालको वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूप अग्नि भस्म कर
डालती है ऐसी समाधिकी सामर्थ्य है, वही दिखाते हैं —
गाथा – ११४
अन्वयार्थ : — [यदि ] जो [निमिषार्धमपि ] आधे निमेषमात्र भी [कोऽपि ] कोई
[परमात्मनि ] परमात्मामें [अनुरागम् ] प्रीतिको [करोति ] करे तो [यथा ] जैसे
[अग्निकणिका ] अग्निकी कणी [काष्ठगिरिं ] काठके पहाड़को [दहति ] भस्म करती है,
उसी तरह [अशेषम् अपि पापम् ] सब ही पापोंको भस्म कर डाले ।
भावार्थ : — ऋद्धिका गर्व, रसायनका गर्व अर्थात् पारा वगैरह आदि धातुओंके
भस्म करनेका मद, अथवा नौ रसके जाननेका गर्व, कवि-कलाका मद, वादमें जीतनेका
nokarmarUp jIvanA sa.nba.ndhavALu.n ane bAkInu.n pudgalAdi pA.nch bhedavALu.n je kA.nI Che te badhu.ny hey
Che. 113.
have, vItarAg nirvikalpa samAdhi antarmuhUrtamA.n ja karmajALane bALI nAkhe Che evu.n dhyAnanu.n
sAmarthya Che, em darshAve Che : —
bhAvArtha: — R^Iddhino garva, rasano garva, (rasAyanano garva arthAt pArA vagere dhAtuone