Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (itrans transliteration). Gatha-123*2 (Adhikar 1).

< Previous Page   Next Page >


Page 198 of 565
PDF/HTML Page 212 of 579

background image
Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
198 ]yogIndudevavirachit: [ adhikAr-1 : dohA-1232
अथ स्थलखंख्याबाह्यं प्रक्षेपकद्वयं कथ्यते
१२३) मणु मिलियउ परमेसरहँ परमेसरु वि मणस्स
बीहि वि समरसि हूवाहँ पुज्ज चडावउँ कस्स ।।१२३“२।।
मनः मिलितं परमेश्वरस्य परमेश्वरः अपि मनसः
द्वयोरपि समरसीभूतयोः पूजां समारोपयामि कस्य ।।१२३“२।।
मणु इत्यादि मणु मनो विकल्परूपं मिलियउ मिलितं तन्मयं जातम् कस्य
संबन्धित्वेन परमेसरहं परमेश्वरस्य परमेसरु वि मणस्स परमेश्वरोऽपि मनः संबन्धित्वेन लीनो
धारण करनेवाला मुनि होता है अर्थात् ऐसे समभावके धारक शांतचित्त योगीश्वरोंके चित्तमें
चिदानंददेव तिष्ठता है ।।१२३।।
इसप्रकार इकतीस दोहा-सूत्रोंका-चूलिका स्थल कहा चूलिका नाम अंतका है, सो
पहले स्थलका अंत यहाँ तक हुआ आगे स्थलकी संख्यासे सिवाय दो प्रक्षेपक दोहा कहते
हैं
गाथा१२३
अन्वयार्थ :[मनः ] विकल्परूप मन [परमेश्वरस्य मिलितं ] भगवान् आत्मारामसे
मिल गयातन्मयी हो गया [परमेश्वरः अपि ] और परमेश्वर भी [मनसः ] मनसे मिल गया
तो [द्वयोः अपि ] दोनों ही को [समरसीभूतयोः ] समरस (आपसमें एकमएक) होने पर
[कस्य ] किसकी अब मैं [पूजां समारोपयामि ] पूजा करूँ
अर्थात् निश्चयनयकर किसीको
पूजना, सामग्री चढ़ाना नहीं रहा
भावार्थ :जब तक मन भगवानसे नहीं मिला था, तब तक पूजा करता था, और
जब मन प्रभुसे मिल गया, तब पूजाका प्रयोजन नहीं है यद्यपि व्यवहारनयकर गृहस्थ-
e pramANe ekatrIs sUtrothI chUlikAsthaL samApta thayu.n.
(chUlikA nAm a.ntanu.n Che, te pahelA sthaLano a.nt ahI.n sudhI thayo.)
have, sthaLasa.nkhyAthI bAhya evA be prakShepako kahe Che :
bhAvArtha:jo ke vyavahAranayathI gR^ihasthAvasthAmA.n viShayakaShAyarUp durdhyAnanI va.nchanA arthe
ane dharmanI vR^iddhi arthe pUjA, abhiShek, dAnAdi vyavahAr hoy Che topaN vItarAg nirvikalpa
1 pAThAntar :परमेश्वरस्य = परमोश्वरस्य परमात्मा