Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
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निरन्तरमभिलषणीयमिति भावार्थः ।।७।।
अथ सर्वेषां परमपुरुषाणां मोक्ष एव ध्येय इति प्रतिपादयति —
१३४) हरि-हर-बंभु वि जिणवर वि मुणि-वर-विंद वि भव्व ।
परम-णिरंजणि मणु धरिवि मुक्खु जि झायहिँ सव्व ।।८।।
हरिहरब्रह्माणोऽपि जिनवरा अपि मुनिवरवृन्दान्यपि भव्याः ।
परमनिरञ्जने मनः धृत्वा मोक्षं एव ध्यायन्ति सर्वे ।।८।।
हरिहर इत्यादि । हरि-हर-बंभु वि हरिहरब्रह्माणोऽपि जिणवर वि जिनवरा अपि मुणि-
वर-विंद वि मुनिवरवृन्दान्यपि भव्व शेषभव्या अपि । एते सर्वे किं कुर्वन्ति । परम-णिरंजणि
है कि हमेशा मोक्षका ही सुख अभिलाषा करने योग्य है, और संसार – पर्याय सब हेय है ।।७।।
आगे सभी महान पुरुषोंके मोक्ष ही ध्यावने योग्य है ऐसा कहते हैं —
गाथा – ८
अन्वयार्थ : — [हरिहरब्रह्माणोऽपि ] नारायण वा इन्द्र, रुद्र अन्य ज्ञानी पुरुष
[जिनवरा अपि ] श्रीतीर्थंकर परमदेव [मुनिवरवृंदान्यपि ] मुनीश्वरोंके समूह तथा [भव्याः ]
अन्य भी भव्य जीव [परमनिरंजने ] परम निरंजनमें [मनः धृत्वा ] मन रखकर [सर्वे ] सब
ही [मोक्षं ] मोक्षको [एव ] ही [ध्यायंति ] ध्यावते हैं । यह मन विषयकषायोंमें जो जाता है,
उसको पीछे लौटाकर अपने स्वरूपमें स्थिर अर्थात् निर्वाणका साधनेवाला करते हैं ।
भावार्थ : — श्री तीर्थंकरदेव तथा चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव, प्रतिवासुदेव महादेव
इत्यादि सब प्रसिद्ध पुरुष अपने शुद्ध ज्ञान, अखंड स्वभाव जो निज आत्मद्रव्य उसका सम्यक्
atishayavALu.n, bAdhArahit, vishAL, vR^iddhi-hAni rahit, viShayothI rahit, nirdvandva (dvandvabhAvathI
rahit), anya dravyanI apekShA vagaranu.n, nirupam, amit, shAshvat, sadAkAL, utkR^iShTa ane ana.nt
sAravALu.n evu.n paramasukh have siddhabhagavAnane utpanna thayu.n.]
ahI.n, AnI ja (mokShanI ja) nira.ntar abhilAShA karavA yogya Che evo bhAvArtha Che. 7.
have, sarva paramapuruShoe mokSha ja dhyAvavA yogya Che, em kahe Che : —
bhAvArtha: — hari, har Adi badhAy prasiddha puruSho khyAti, pUjA, lAbh Adi samasta
vikalpa jALathI shUnya evA, shuddha, buddha ek svabhAvavALA nijaAtmadravyanA.n samyakshraddhAn,
212 ]yogIndudevavirachit: [ adhikAr-2 : dohA-8