Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
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१३९) पेच्छइ जाणइ अणुचरइ अप्पिं अप्पउ जो जि ।
दंसणु णाणु चरित्तु जिउ मोक्खहँ कारणु सो जि ।।१३।।
पश्यति जानाति अनुचरति आत्मना आत्मानं य एव ।
दर्शनं ज्ञानं चारित्रं जीवः मोक्षस्य कारणं स एव ।।१३।।
पेच्छइ इत्यादि । पेच्छइ पश्यति जाणइ जानाति अणुचरइ अनुचरति । केन कृत्वा । अप्पिं
आत्मना कारणभूतेन । कं कर्मतापन्नम् । अप्पउ निजात्मानम् । जो जि य एव कर्ता दंसणु णाणु
चरित्तु दर्शनज्ञानचारित्रत्रयं भवतीति क्रियाध्याहारः । कोऽसौ भवति । जिउ जीवः य एवाभेदनयेन
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रयं १भवतीति मोक्खहं कारणु निश्चयेन मोक्षस्य कारणं एक एव सो जि
स एव निश्चयरत्नत्रयपरिणतो जीव इति । तथाहि । यः कर्ता निजात्मानं मोक्षस्य कारणभूतेन
गाथा – १३
अन्वयार्थ : — [य एव ] जो [आत्मना ] अपनेसे [आत्मानं ] आपको [पश्यति ]
देखता है, [जानाति ] जानता है, [अनुचरति ] आचरण करता है, [स एव ] वही विवेकी
[दर्शनं ज्ञानं चारित्रं ] दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप परिणत हुआ [जीवः ] जीव [मोक्षस्य कारणं ]
मोक्षका कारण है ।
भावार्थ : — जो सम्यग्दृष्टि जीव अपने आत्माको आपकर निर्विकल्परूप देखता है,
अथवा तत्त्वार्थश्रद्धानकी अपेक्षा चंचलता और मलिनता तथा शिथिलता इनका त्यागकर
शुद्धात्मा ही उपादेय है, इसप्रकार रुचिरूप निश्चय करता है, वीतराग स्वसंवेदनलक्षण ज्ञानसे
जानता है, और सब रागादिक विकल्पोंके त्यागसे निज स्वरूपमें स्थिर होता है, सो
निश्चयरत्नत्रयको परिणत हुआ पुरुष ही मोक्षका मार्ग है । ऐसा कथन सुनकर प्रभाकरभट्टने
bhAvArtha : — je AtmAthI nij AtmAne mokShanA kAraNarUpe dekhe Che nirvikalpa svarUpe
avaloke Che ane tattvArthashraddhAnanI apekShAe chal, malin ane agADh doShone tajIne ‘ek shuddha
AtmA ja upAdey Che evI ruchirUpe nirNay kare Che, mAtra nishchay kare Che eTalu.n ja nahi paN
vItarAgasvasa.nvedan jenu.n lakShaN Che evA abhedaj~nAnathI jANe Che-parichChedan kare Che, mAtra
parichChedan kare Che eTalu.n ja nahi paN rAgAdi samasta vikalpono tyAg karIne anuchare Che —
tyA.nj — nijasvarUpamA.n ja – sthir thAy Che te nishchayaratnatrayapariNat puruSh ja nishchayamokShamArga Che.
1 pAThAntar : — भवतीति=भवति
adhikAr-2 : dohA-13 ]paramAtmaprakAsh: [ 221