Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (itrans transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
284 ]yogIndudevavirachit: [ adhikAr-2 : dohA-41
यावत् ज्ञानी उपशाम्यति तावत् संयतो भवति
भवति कषायाणां वशे गतः जीवः असंयतः स एव ।।४१।।
जांवइ इत्यादि जांवइ यदा काले णाणिउ ज्ञानी जीवः उवसमइ उपशाम्यति ताम-
तदा काले संजदु होइ संयतो भवति होइ भवति कसायहं वसि गयउ कषायवशं गतः
जीउ जीवः कथंभूतो भवति असंजदु असंयतः कोऽसौ सोइ स एव पूर्वोक्त जीव इति
अयमत्र भावार्थः अनाकुलत्वलक्षणस्य स्वशुद्धात्मभावनोत्थपारमार्थिकसुखस्यानुकूलपरमोपशमे
यदा ज्ञानी तिष्ठति तदा संयतो भवति तद्विपरीत परमाकुलत्वोत्पादककामक्रोधादौ परिणतः
पुनरसंयतो भवतीति
तथा चोक्त म्‘‘अकसायं तु चरित्तं कषायवसगदो असंजदो होदि
उवसमइ जम्हि काले तक्काले संजदो होदि’’ ।।४१।।
bhAvArtha:anAkuLatA jenu.n lakShaN Che evA, svashuddhAtmAnI bhAvanAthI utpanna
pAramArthik sukhane anukUL param upashamabhAvamA.n jyAre j~nAnI sthit hoy Che tyAre te sa.nyat hoy
Che ane tenAthI viparIt paramAtmAmA.n AkuLatAnA utpAdak kAmakrodhAdimA.n pariNamelo hoy Che
tyAre asa.nyat hoy Che. kahyu.n paN Che ke
‘‘अकसायं तु चरितं कसायवसगदो असंजदो होदि ।।’’
उवसमइ जम्हि काले तक्काले संजदा होदि ।।’’
[artha:akaShAyabhAv (kaShAyano abhAv) te chAritra Che, kaShAyane vash thayelo jIv
गाथा४१
अन्वयार्थ :[यदा ] जिस समय [ज्ञानी जीवः ] ज्ञानी जीव [उपशाम्यति ]
शांतभावको प्राप्त होता है, [तदा ] उस समय [संयतः भवति ] संयमी होता है, और
[कषायाणां ] क्रोधादि कषायोंके [वशे गतः ] आधीन हुआ [स एव ] वही जीव [असंयतः ]
असंयमी [भवति ] होता है
भावार्थ :आकुलता रहित निज शुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न हुआ निर्विकल्प
(असली) सुखका कारण जो परम शांतभाव उसमें जिस समय ज्ञानी ठहरता है, उसी समय
संयमी कहलाता है, और आत्मभावनामें परम आकुलताके उपजानेवाले काम क्रोधादिक
अशुद्ध भावोंमें परिणमता हुआ जीव असंयमी होता है, इसमें कुछ संदेह नहीं है
ऐसा
दूसरी जगह भी कहा है ‘अकसायं’ इत्यादि अर्थात् कषायका जो अभाव है, वही चारित्र
है, इसलिये कषायके आधीन हुआ जीव असंयमी होता है, और जब कषायोंको शांत करता