Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (itrans transliteration). Gatha-46 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
292 ]yogIndudevavirachit: [ adhikAr-2 : dohA-46
करोति पुनरपि किं करोति सत्तु वि मिल्लिवि शत्रुमपि मुञ्चति कथंभूतं शत्रुम्
अप्पणउ आत्मीयम् पुनश्च किं करोति परहं णिलीणु हवेइ परस्यापि लीनः अधीनो
भवति इति अयमत्र भावार्थः यो रागादिरहितस्य समभावलक्षणस्य निजपरमात्मनो भावनां
करोति स पुरुषः शत्रुशब्दवाच्यं ज्ञानावरणादिकर्मरूपं निश्चयशत्रु मुञ्चति परशब्दवाच्यं
परमात्मानमाश्रयति च तेन कारणेन तस्य स्तुतिर्भवति
अथवा यथा लोकव्यवहारेण
बन्धनबद्धं निजशत्रुं मुक्त्वा कोऽपि केनापि कारणेन तस्यैव परशब्दवाच्यस्य शत्रोरधीनो
भवति तेन कारणेन स निन्दां लभते तथा शब्दच्छलेन तपोधनोऽपीति
।।४५।।
अथ
१७२) अण्णु वि दोसु हवेइ तसु जो समभाउ करेइ
वियलु हवेविणु इक्कलउ उप्परि जगहँ चडेइ ।।४६।।
अन्यः अपि दोषः भवति तस्य यः समभावं करोति
विकलः भूत्वा एकाकी उपरि जगतः आरोहति ।।४६।।
evA paramAtmAno Ashray kare Che, te kAraNe tenI stuti thAy Che athavA jevI rIte lokavyavahAramA.n
ba.ndhanathI ba.ndhAyel nijashatrune ChoDIne koI paN kAraNe pote ja ‘par’ shabdathI vAchya evA
shatrune AdhIn thAy Che tethI ni.ndA pAme Che, tevI rIte tapodhan paN shabdanA ChaLathI ni.ndA pAme
Che. 45.
भी शब्दकी योजनासे निंदा द्वारा स्तुति की गई है, वह इस तरहसे है कि शत्रु शब्दसे कहे गये
जो ज्ञानावरणादि कर्म
शत्रु उनको छोड़कर पर शब्दसे कहे गये परमात्माका आश्रय करता है
इसमें निंदा क्या हुआ, बल्कि स्तुति ही हुई परंतु लोकव्यवहारमें अपने आधीन शत्रुको छोड़कर
किसी कारणसे पर शब्दसे कहे गये शत्रुके आधीन आप होता है, इसलिये लौकिकनिंदा हुई;
यह शब्दके निंदास्तुति की गई वह शब्दसे श्लेष होनेसे रूपअलंकार कहा गया है ।।४५।।
आगे समदृष्टिकी फि र भी निंदास्तुति करते हैं
गाथा४६
अन्वयार्थ :[यः ] जो तपस्वी महामुनि [समभावं ] समभावको [करोति ] करता
1 pAThAntar:मुञ्चति = मुक्त्वा