Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
294 ]yogIndudevavirachit: [ adhikAr-2 : dohA-46❃1
या निशा सकलानां देहिनां योगी तस्यां जागर्ति ।
यत्र पुनः जागर्ति सकलं जगत् तां निशां मत्वा स्वपिति ।।४६❃१।।
जा णिसि इत्यादि । जा णिसि या वीतरागपरमानन्दैकसहजशुद्धात्मावस्था
मिथ्यात्वरागाद्यन्धकारावगुण्ठिता सती रात्रिः प्रतिभाति । केषाम् । सयलहं देहियहं सकलानां
स्वशुद्धात्मसंवित्तिरहितानां देहिनाम् । जोग्गिउ तहिं जग्गेइ परमयोगी वीतरागनिर्विकल्प-
स्वसंवेदनज्ञानरत्नप्रदीपप्रकाशेन मिथ्यात्वरागादिविकल्पजालान्धकारमपसार्य स तस्यां तु
शुद्धात्मना जागर्ति । जहिं पुणु जग्गइ सयलु जगु यत्र पुनः शुभाशुभमनोवाक्काय-
परिणामव्यापारे परमात्मतत्त्वभावनापराङ्मुखः सन् जगज्जागर्ति स्वशुद्धात्मपरिज्ञानरहितः
bhAvArtha: — svashuddhAtmAnA sa.nvedanathI rahit sarva sa.nsArI jIvone, je vItarAg
paramAna.ndarUp ek sahaj shuddhAtmAnI avasthA mithyAtva, rAgAdi a.ndhakArathI ChavAyelI rAt lAge
Che te shuddhAtmAnI avasthAmA.n to te paramayogI, vItarAganirvikalpa svasa.nvedanaj~nAnarUpI
ratnadIpakanA prakAshathI mithyAtva, rAgAdi vikalpajALarUp a.ndhakArane ChoDIne shuddhasvarUp vaDe jAge
Che.
vaLI, svashuddhAtmAnA parij~nAnathI rahit sakaL aj~nAnIjan paramAtmatattvanI bhAvanAthI
parAnmukh thato je shubhAshubh man-vachan-kAyAnA pariNAmanA vyApAramA.n jAge Che, tene rAtri mAnIne
गाथा – ४६❃१
अन्वयार्थ : — [या ] जो [सकलानां देहिनां ] सब संसारी जीवोंकी [निशा ] रात है,
[तस्यां ] उस रात में [योगी ] परम तपस्वी [जागर्ति ] जागता है, [पुनः ] और [यत्र ] जिसमें
[सकलं जगत् ] सब संसारी जीव [जागर्ति ] जाग रहे हैं, [तां ] उस दशाको [निशां मत्वा ]
योगी रात मानकर [स्वपिति ] योग निद्रामें सोता है ।
भावार्थ : — जो जीव वीतराग परमानंदरूप सहज शुद्धात्माकी अवस्थासे रहित हैं,
मिथ्यात्व रागादि अंधकार से मंडित हैं, इसलिये इन सबोंको वह परमानंद अवस्था रात्रिके समान
मालूम होती है । कैसे ये जगतके जीव हैं, कि आत्म – ज्ञानसे रहित हैं, अज्ञानी हैं, और अपने
स्वरूपसे विमुख हैं, जिनके जाग्रत – दशा नहीं हैं, अचेत सो रहे हैं, ऐसी रात्रि में वह परमयोगी
वीतराग निर्विकल्प स्वसंवेदन ज्ञानरूपी रत्नदीपके प्रकाशसे मिथ्यात्व रागादि विकल्प – जालरूप
अंधकारको दूरकर अपने स्वरूपमें सावधान होनेसे सदा जागता है । तथा शुद्धात्माके ज्ञानसे
रहित शुभ, अशुभ मन, वचन, कायके परिणमनरूप व्यापारवाले स्थावर जंगम सकल अज्ञानी
जीव परमात्मतत्त्वकी भावनासे परान्मुख हुए विषय – कषायरूप अविद्यामें सदा सावधान हैं, जाग