Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (itrans transliteration). Gatha-51 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
विषयासक्त स्येति भावार्थः ।।५०।।
अथ
१७८) देहहँ उप्परि परम-मुणि देसु वि करइ ण राउ
देहहँ जेण वियाणियउ भिण्णउ अप्प-सहाउ ।।५१।।
देहस्य उपरि परममुनिः द्वेषमपि करोति न रागम्
देहाद् येन विज्ञातः भिन्नः आत्मस्वभावः ।।५१।।
देहहं इत्यादि देहहं उप्परि देहस्योपरि परम-मुणि परममुनिः देसु वि करइ ण राउ
द्वेषमपि न करोति न रागमपि येन किं कृतम् देहहं जेण वियाणियउ देहात्सकाशाद्येन
विज्ञातः कोऽसौ भिण्णउ अप्प-सहाउ आत्मस्वभावः कथंभूतो विज्ञातः तस्माद्देहाद्भिन्न
इति तथाहि‘‘सपरं बाधासहिदं विच्छिण्णं बंधकारणं विसमं जं इंदिएहिं लद्धं तं सुक्खं
ja A vyAkhyAn shobhe Che paN jeo viShayamA.n Asakta Che temane A kathan shobhatu.n nathI, evo
bhAvArtha Che. 50.
vaLI (have, param muni deh upar paN rAg-dveSh karato nathI, em kahe Che.) :
bhAvArtha:kahyu.n paN Che keसपरं बाधासहिदं विच्छिण्णं विसमं ज इंदिएहिं लद्धं तं सुक्खं
दुक्खमेव तहा ।। (shrI pravachanasAr 76) artha:je indriyothI prApta thAy Che, te sukh paranA
sa.nba.ndhavALu.n, bAdhAsahit, vichChinna, ba.ndhanu.n kAraN ane viSham Che; (e rIte te duHkh ja Che.)
adhikAr-2 : dohA-51 ]paramAtmaprakAsh: [ 301
है, और विषयाभिलाषीको नहीं शोभता ।।५०।।
आगे साधु देहके ऊ पर भी राग-द्वेष नहीं करता
गाथा५१
अन्वयार्थ :[परममुनिः ] महामुनि [देहस्य उपरि ] मनुष्यादि शरीरके ऊ पर भी
[रागमपि द्वेषम् ] राग और द्वेषको [न करोति ] नहीं करता अर्थात् शुभ शरीरसे राग नहीं
करता, अशुभ शरीरसे द्वेष नहीं करता, [येन ] जिसने [आत्मस्वभावः ] निजस्वभाव [देहात् ]
देहसे [भिन्नः विज्ञातः ] भिन्न जान लिया है
देह तो जड़ है, आत्मा चैतन्य है, जड़ चैतन्यका
क्या संबंध ?
भावार्थ :इन इंद्रियोंसे जो सुख उत्पन्न हुआ है, वह दुःखरूप ही है ऐसा कथन
श्रीप्रवचनसारमें कहा है ‘सपरम’ इत्यादि इसका तात्पर्य ऐसा है, कि जो इन्द्रियोंसे सुख प्राप्त