Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (itrans transliteration). Gatha-59 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
भावार्थः तथा चोक्त म्‘‘वरं नरकवासोऽपि सम्यक्त्वेन हि संयुतः न तु सम्यक्त्वहीनस्य
निवासो दिवि राजते ।।’’ ।।५८।।
अथ तमेवार्थ पुनरपि द्रढयति
१८६) जे णिय - दंसण - अहिमुहा सोक्खु अणंतु लहंति
तिं विणु पुण्णु करंता वि दुक्खु अणंतु सहंति ।।५९।।
ये निजदर्शनाभिमुखाः सौख्यमनन्तं लभन्ते
तेन विना पुण्यं कुर्वाणा अपि दुःखमनन्तं सहन्ते ।।५९।।
जे णिय इत्यादि जे ये केचन णिय-दंसण-अहिमुहा निजदर्शनाभिमुखास्ते पुरुषाः
सोक्खु अणंतु लहंति सौख्यमनन्तं लभन्ते अपरे केचन तिं विणु पुण्णु करंता वि तेन
सम्यक्त्वेन विना पुण्यं कुर्वाणा अपि दुक्खु अणंतु सहंति दुःखमनन्तं सहन्त इति
तथाहि निजशुद्धात्मतत्त्वोपलब्धिरुचिरूपनिश्चयसम्यक्त्वाभिमुखा ये ते केचनास्मिन्नेव भवे
paChI narakAdimA.n jAy Che, evo bhAvArtha Che. kahyu.n paN Che ke :‘‘वरं नरकवासोऽपि सम्यक्त्वेन
हि संयुतः न तु सम्यक्त्वहीनस्य निवासो दिवि राजते ।।’’ (samyaktva sahit narakavAs paN sAro
Che paN samyaktva vagaranA jIvane svargano nivAs paN shobhato nathI.) 58.
have, te ja arthane pharIthI draDh kare Che :
bhAvArtha:nijashuddhAtmatattvanI prAptinI ruchirUp nishchayasamyaktvanI sanmukh jeo Che,
adhikAr-2 : dohA-59 ]paramAtmaprakAsh: [ 317
होवेंगे ऐसा दूसरी जगह भी ‘‘वरं’’ इत्यादि श्लोकसे कहा है, कि सम्यक्त्व सहित
नरकमें रहना भी अच्छा, और सम्यक्त्व रहितका स्वर्गमें निवास भी शोभा नहीं देता ।।५८।।
अब इसी बातको फि र भी दृढ़ करते हैं
गाथा५९
अन्वयार्थ :[ये ] जो [निजदर्शनाभिमुखाः ] सम्यग्दर्शनके सन्मुख हैं, वे [अनन्तं
सुखं ] अनन्त सुखको [लभन्ते ] पाते हैं, [तेन विना ] और जो जीव सम्यक्त्व रहित हैं, वे
[पुण्यं कुर्वाणा अपि ] पुण्य भी करते हैं, तो भी पुण्यके फ लसे अल्प सुख पाके संसारमें
[अनंतं दुःखम् ] अनन्त दुःख [सहंते ] भोगते हैं
भावार्थ :निज शुद्धात्माकी प्राप्तिरूप निश्चयसम्यक्त्वके सन्मुख हुए जो सत्पुरुष हैं,