Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
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लेशतोऽपि न गुणास्तेषां तथाप्युद्धताः ।।’’ ।।६०।।
अथ देवशास्त्रगुरुभक्त्या मुख्यवृत्त्या पुण्यं भवति न च मोक्ष इति प्रतिपादयति —
१८८) देवहं सत्थहं मुणिवरहँ भत्तिए पुण्णु हवेइ ।
कम्म-क्खउ पुणु होइ णवि अज्जउ संति भणेइ ।।६१।।
देवानां शास्त्राणां मुनिवराणां भक्त्या पुण्यं भवति ।
कर्मक्षयः पुनः भवति नैव आर्यः शान्ति भणति ।।६१।।
देवहं इत्यादि । देवहं सत्थहं मुणिवरहं भत्तिए पुण्णु हवेइ देवशास्त्रमुनीनां भक्त्या पुण्यं
भवति कम्म-क्खउ पुणु, होइ णवि कर्मक्षयः पुनर्मुख्यवृत्त्या नैव भवति । एवं कोऽसौ भणति ।
320 ]yogIndudevavirachit: [ adhikAr-2 : dohA-61
हैं, तो भी उनके उद्धतपना है, यानी गुण तो रंचमात्र भी नहीं, और अभिमानमें बुद्धि रहती
है ।।६०।।
आगे देव-गुरु-शास्त्रकी भक्तिसे मुख्यतासे तो पुण्यबंध होता है, उससे परम्पराय मोक्ष
होता है, साक्षात् मोक्ष नहीं, ऐसा कहते हैं —
गाथा – ६१
अन्वयार्थ : — [देवानां शास्त्राणां मुनिवराणां ] श्रीवीतरागदेव, द्वादशांग शास्त्र और
दिगम्बर साधुओंकी [भक्त्या ] भक्ति करनेसे [पुण्यं भवति ] मुख्यतासे पुण्य होता है, [पुनः ]
लेकिन [कर्मक्षयः ] तत्काल कर्मोंका क्षय [नैव भवति ] नहीं होता, ऐसा [आर्यः शांतिः ]
शांति नाम आर्य अथवा कपट रहित संत पुरुष [भणति ] कहते हैं ।
भावार्थ : — सम्यक्त्वपूर्वक जो देव-गुरु-शास्त्रकी भक्ति करता है, उसके मुख्य तो
yAchakone lakShmInu.n pUrNadAn ane nivR^ittinA nirvANamArgamA.n gaman, AvA guNo jenAmA.n rahyA
hatA ChatA.n paN teo abhimAnathI rahit hatA, em AgamathI jANavA maLe Che paN
Ashcharya Che ke hAlamA.n-pa.nchamakALamA.n-lesh paN guNo na hoy topaN manuShyo uddhat Che –
abhimAnI Che.) 60.
have, dev-guru-shAstranI bhaktithI mukhyapaNe puNya thAy Che paN mokSha thato nathI, em kahe
Che : —
bhAvArtha: — samyaktvapUrvak devagurushAstranI bhaktithI mukhyapaNe puNya ja thAy Che
paN mokSha nahi.