Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
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लोचनां त्यजन्तीति त्रिकलेन कथयति —
१९१) वंदणु णिंदणु पडिकमणु पुण्णहँ कारणु जेण ।
करइ करावइ अणमणइ एक्कु वि णाणिण तेण ।।६४।।
वन्दनं निन्दनं प्रतिक्रमणं पुण्यस्य कारणं येन ।
करोति कारयति अनुमन्यते एकमपि ज्ञानी न तेन ।।६४।।
वंदणु इत्यादि । वंदणु णिंदणु पडिकमणु वन्दननिन्दनप्रतिक्रमणत्रयम् । किं विशिष्टम् ।
पुण्णहं कारणु पुण्यस्य कारणं जेण येन कारणेन करइ करावइ अणुमणइ करोति कारयति
अनुमोदयति, एक्कु वि एकमपि, णाणि ण तेण ज्ञानी पुरुषो न तेन कारणेनेति । तथाहि ।
adhikAr-2 : dohA-64 ]paramAtmaprakAsh: [ 325
उसमें ठहरकर व्यवहारप्रतिक्रमण, व्यवहारप्रत्याख्यान और व्यवहार आलोचनारूप शुभोपयोगको
छोड़े, ऐसा कहते हैं —
गाथा – ६४
अन्वयार्थ : — [वंदनं ] पंचपरमेष्ठीकी वंदना, [निंदनं ] अपने अशुभ कर्मकी निंदा,
और [प्रतिक्रमणं ] अपराधोंकी प्रायश्चित्तादि विधिसे निवृत्ति, ये सब [येन पुण्यस्य कारणं ]
जो पुण्यके कारण हैं, मोक्षके कारण नहीं हैं, [तेन ] इसीलिये पहली अवस्थामें पापके दूर
करनेके लिये ज्ञानी पुरुष इनको करता है, कराता है, और करते हुएको भला जानता है तो
भी निर्विकल्प शुद्धोपयोग अवस्थामें [ज्ञानी ] ज्ञानी जीव [एकमपि ] इन तीनोंमेंसे एक भी
[न करोति ] न तो करता है, [कारयति ] न कराता है, और न [अनुमन्यते ] करते हुए को
भला जानता है
।
भावार्थ : — केवल शुद्ध स्वरूपमें जिसका चित्त लगा हुआ है, ऐसा निर्विकल्प
परमात्मतत्त्वकी भावनाके बलसे देखे, सुने और अनुभव किये भोगोंकी वाँछारूप जो
भूतकालके रागादि दोष उनका दूर करना वह निश्चयप्रतिक्रमण; वीतराग चिदानन्द शुद्धात्माकी
thaIne vyavahArapratikramaN, vyavahArapratyAkhyAn ane vyavahAraAlochanAne ChoDe Che, em traN gAthA
dvArA kahe Che : —
bhAvArtha: — shuddha nirvikalpa paramAtmatattvanI bhAvanAnA baLathI dekhelA, sA.nbhaLelA ane
anubhavelA bhogonI AkA.nkShAnA smaraNarUp atItakALanA rAgAdidoShonu.n nirAkaraN karavu.n te
nishchay pratikramaN Che, ek (kevaL) vItarAg chidAna.ndanI anubhUtinI bhAvanAnA baLathI