Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
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१९२) वंदणु णिदणु पडिकमणु णाणिहिँ एहु ण जुत्तु ।
एक्कु जि मेल्लिवि णाणमउ सुद्धउ भाउ पवित्तु ।।६५।।
वन्दनं निन्दनं प्रतिक्रमणं ज्ञानिनां इदं न युक्त म् ।
एकमेव मुक्त्वा ज्ञानमयं शुद्धं भावं पवित्रम् ।।६५।।
वंदणु णिंदणु पडिकमणु वन्दननिन्दनप्रतिक्रमणत्रयम् । णाणिहिँ एहु ण जुत्तु
ज्ञानिनामिदं न युक्त म् । किं कृत्वा । एक्कु जि मेल्लिवि एकमेव मुक्त्वा । एकं कम् । णाणमउ
सुद्धउ भाउ पवित्तु ज्ञानमयं शुद्धभावं पवित्रमिति । तथाहि । पञ्चेन्द्रियभोगाकांक्षाप्रभृति-
समस्तविभावरहितः शून्यः केवलज्ञानाद्यनन्तगुणपरमात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूप-
निर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्नसहजानन्दपरमसमरसीभावलक्षणसुखामृतरसास्वादेन भरितामृतस्थो योऽसौ
ज्ञानमयो भावः तं भावं मुक्त्वाऽन्यद्वयव्यवहारप्रतिक्रमणप्रत्याख्यानालोचनत्रयं तदनुकूलं वन्दन-
निन्दनादिशुभोपयोगविकल्पजालं च ज्ञानिनां युक्तं न भवतीति तात्पर्यम् ।।६५।।
adhikAr-2 : dohA-65 ]paramAtmaprakAsh: [ 327
गाथा – ६५
अन्वयार्थ : — [वंदन निंदनं प्रतिक्रमणं ] वंदना, निंदा, और प्रतिक्रमण [इदं ] ये
तीनों [ज्ञानिनां ] पूर्ण ज्ञानियोंको [युक्त म् न ] ठीक नहीं हैं, [एकमेव ] एक [ज्ञानमयं ]
ज्ञानमय [शुद्धं पवित्रम् भावं ] पवित्र शुद्ध भावको [मुक्त्वा ] छोड़कर अर्थात् इसके सिवाय
ज्ञानीको कोई कार्य करना योग्य नहीं है ।
भावार्थ : — पाँच इन्द्रियोंके भोगोंकी वाँछा आदि लेकर संपूर्ण विभावोंसे रहित जो
केवलज्ञानादि अनंतगुणरूप परमात्मतत्त्व उसके सम्यक् श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप निर्विकल्प
समाधिसे उत्पन्न जो परमानंद परमसमरसीभाव वही हुआ अमृत - रस उसके आस्वादसे पूर्ण जो
ज्ञानमयीभाव उसे छोड़कर अन्य व्यवहारप्रतिक्रमण प्रत्याख्यान आलोचनाके अनुकूल वंदन
निंदनादि शुभोपयोग विकल्प – जाल हैं, वे पूर्ण ज्ञानीको करने योग्य नहीं हैं । प्रथम अवस्थामें
ही हैं, आगे नहीं है ।।६५।।
bhAvArtha : — pA.nch indriyonA bhogonI AkA.nkShA AdithI mA.nDIne samasta vibhAvathI rahit
kevaLaj~nAnAdi ana.ntaguNarUp paramAtmatattvanA.n samyakshraddhAn, samyagj~nAn ane samyag anuShThAnarUp
nirvikalpa samAdhithI utpanna sahaj paramAna.ndarUp param-samarasIbhAvasvarUp sukhAmR^itarasanA
AsvAdathI paripUrNa je j~nAnamay bhAv Che te bhAv sivAy anya vyavahArapratikramaN,
vyavahArapratyAkhyAn, vyavahAraAlochanA e traNeyane anukUL va.ndanA, ni.ndA Adi shubhopayoganI
vikalpajAL j~nAnIone yogya nathI. 65.