Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (itrans transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
भाउ इत्यादि भाउ भावः परिणामः कथंभूतः विसुद्धउ विशेषेण शुद्धो
मिथ्यात्वरागादिरहितः अप्पणउ आत्मीयः धम्मु भणेविणु लेहु धर्म भणित्वा मत्वा
प्रगृह्णीथाः
यो धर्मः किं करोति चउ-गइ-दुक्खहं जा धरइ चतुर्गतिदुःखेभ्यः सकाशात्
उद्धत्य यः कर्ता धरति कं धरति जीउ पडंतउ एहु जीवमिमं प्रत्यक्षीभूतं संसारे
पतन्तमिति तद्यथा धर्मशब्दस्य व्युत्पत्तिः क्रियते संसारे पतन्तं प्राणिनमुद्धृत्य नरेन्द्र
नागेन्द्रदेवेन्द्रवन्द्ये मोक्षपदे धरतीति धर्मं इति धर्मशब्देनात्र निश्चयेन जीवस्य शुद्धपरिणाम
एव ग्राह्यः
तस्य तु मध्ये वीतरागसर्वज्ञप्रणीतनयविभागेन सर्वे धर्मा अन्तर्भूता लभ्यन्ते
तथा अहिंसालक्षणो धर्मः, सोऽपि जीवशुद्धभावं विना न संभवति सागारानगारलक्षणो
धर्मः सोऽपि तथैव उत्तमक्षमादिदशविधो धर्मः सोऽपि जीवशुद्धभावमपेक्षते
‘सद्रष्टिज्ञानवृत्तानि धर्मं धर्मेश्वरा विदुः’ इत्युक्तं यद्धर्मलक्षणं तदपि तथैव रागद्वेषमोहरहितः
adhikAr-2 : dohA-68 ]paramAtmaprakAsh: [ 333
bhAvArtha:‘dharma’ shabdanI vyutpatti karavAmA.n Ave Che ke ‘sa.nsAramA.n paDatA prANIone
bachAvIne je narendra, nAgendra ane devendrathI va.ndya mokShapadamA.n dhArI rAkhe Che te dharma Che. ‘dharma’
shabdathI ahI.n nishchayathI jIvanA shuddha pariNAm ja samajavA ane temA.n (te shuddha pariNAmamA.n ja)
vItarAgasarvaj~napraNIt nayavibhAgathI sarva dharmo antarbhUt thAy Che. jem ke ahi.nsAsvarUp dharma, te
paN jIvanA shuddha bhAv vinA hoto nathI. yatishrAvakano dharma, sAgAr aNagAr dharma, te paN
tem ja uttamakShamAdi dashaprakArano dharma te paN jIvanA shuddha bhAvanI apekShA rAkhe Che.
‘‘सद्रष्टिज्ञानवृत्तानि धर्मं धर्मेश्वरा विदुः’’
[आत्मीयः ] अपना है, और अशुद्ध परिणाम अपने नहीं हैं, सो शुद्ध भावको ही [धर्मं भणित्वा ]
धर्म समझकर [गृह्णीथाः ] अंगीकार करो
[यः ] जो आत्मधर्म [चतुर्गतिदुःखेभ्यः ] चारों
गतियोंके दुःखोंसे [पतंतम् ] संसारमें पड़े हुए [इमम् जीवं ] इस जीवको निकालकर [धरति ]
आनंद
स्थानमें रखता है
भावार्थ :धर्म शब्दका शब्दार्थ ऐसा है, कि संसारमें पड़ते हुए प्राणियोंको
निकालकर मोक्षपदमें रखे, वह धर्म है, वह मोक्षपद देवेन्द्र, नागेन्द्र, नरेन्द्रोंकर वंदने योग्य
है जो आत्माका निज स्वभाव है वही धर्म है, उसीमें जिनभाषित सब धर्म पाये जाते हैं
जो दयास्वरूप धर्म है, वह भी जीवके शुद्ध भावोंके बिना नहीं होता, यति श्रावकका धर्म भी
शुद्ध भावोंके बिना नहीं होता, उत्तम क्षमादि दशलक्षणधर्म भी शुद्ध भाव बिना नहीं हो सकता,
और रत्नत्रयधर्म भी शुद्ध भावोंके बिना नहीं हो सकता
ऐसा ही कथन जगह जगह ग्रंथोंमें
है, ‘‘सद्दृष्टि’’ इत्यादि श्लोकसेउसका अर्थ यह है, कि धर्मके ईश्वर भगवान्ने सम्यग्दर्शन,