Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Malayalam transliteration). Gatha-83 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
൧൪൦ ]യോഗീന്ദുദേവവിരചിത: [ അധികാര-൧ : ദോഹാ-൮൩
८३) जणणी जणणु वि कंत घरु पत्तु वि मित्तु वि दव्वु
माया-जालु वि अप्पणउ मूढउ मण्णइ सव्वु ।।८३।।
जननी जननः अपि कान्ता गृहं पुत्रोऽपि मित्रमपि द्रव्यम्
मायाजालमपि आत्मीयं मूढः मन्यते सर्वम् ।।८३।।
जणणी जणणु वि कंत घरु पुत्तु वि मित्तु वि दव्वु जननी माता जननः पितापि
कान्ता भार्या गृहं पुत्रोऽपि मित्रमपि द्रव्यं सुवर्णादि यत्तत्सर्वं मायाजालु वि अप्पणउ मूढउ
मण्णइ सव्वु मायाजालमप्यसत्यमपि कृत्रिममपि आत्मीयं स्वकीयं मन्यते
कोऽसौ मूढो
मूढात्मा कतिसंख्योपेतमपि सर्वमपीति अयमत्र भावार्थः जनन्यादिकं परस्वरूपमपि
शुद्धात्मनो भिन्नमपि हेयस्याशेषनारकादिदुःखस्य कारणत्वाद्धेयमपि साक्षादुपादेयभूताना-
आगे फि र भी कहते हैं
गाथा८३
अन्वयार्थ :[जननी ] माता, [जननः ], पिता [अपि ] और [कान्ता ] स्त्री [गृहं ]
घर [पुत्रः अपि ] और बेटा, बेटी [मित्रमपि ] मित्र वगैरह सब कुटुम्बीजन बहिन, भानजी,
नाना, मामा, भाई, बंधु और [द्रव्यं ] रत्न, माणिक, मोती, सुवर्ण, चांदी, धन, धान्य, द्विपदवांदी
धाय, नौकर, चौपाये-गाय, बैल, घोड़ी, ऊ ँट, हाथी, रथ, पालकी, बहली, ये [सर्व ] सर्व
[मायाजालमपि ] असत्य हैं, कर्मजनित हैं, तो भी [मूढ़ः ] अज्ञानी जीव [आत्मीयं ] अपने
[मन्यते ] मानता है
भावार्थ :ये माता पिता आदि सब कुटुम्बीजन परस्वरूप भी हैं, सब स्वारथके हैं,
शुद्धात्मासे भिन्न भी हैं शरीर संबंधी हैं, हेयरूप संसारीक नारकादि दुःखोंके कारण होनेसे त्याज्य
भी हैं, उनको जो जीव साक्षात् उपादेयरूप अनाकुलतास्वरूप परमार्थिक सुखसे अभिन्न वीतराग
परमानंदरूप एकस्वभाववाले शुद्धात्मद्रव्यमें लगाता है, अर्थात अपने मानता है, वह मन, वचन
ഹവേ (ഫരീ പണ മൂഢാത്മാനും ലക്ഷണ കഹേ ഛേ) :
ഭാവാര്ഥ:മന-വചന-കായനാ വ്യാപാരമാം പരിണമേലോ, സ്വശുദ്ധാത്മദ്രവ്യനീ ഭാവനാഥീ ശൂന്യ
ഏവോ മൂഢാത്മാ മാതാ ആദി പരസ്വരൂപ ഛേ, ശുദ്ധ ആത്മാഥീ ഭിന്ന ഛേ, ഹേയ ഏവാ സമസ്ത നാരകാദി
ദുഃഖനാം കാരണ ഹോവാഥീ ഹേയ ഛേ തോപണ, തേമനേ സാക്ഷാത് ഉപാദേയഭൂത അനേ അനാകുളതാ ജേനും ലക്ഷണ
ഛേ ഏവാ പാരമാര്ഥിക സൌഖ്യഥീ അഭിന്ന, വീതരാഗപരമാനംദ ജ ജേനോ ഏക സ്വഭാവ ഛേ ഏവാ