Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
൧൪൬ ]യോഗീന്ദുദേവവിരചിത: [ അധികാര-൧ : ദോഹാ-൮൮
१
स्वशुद्धात्मस्वरूपेण योजयतीति तात्पर्यार्थः ।।८७।। अथ —
८८) अप्पा वंदउ खवणु ण वि अप्पा गुरउ ण होइ ।
अप्पा लिंगिउ एक्कु ण वि णाणिउ जाणइ जोइ ।।८८।।
आत्मा वन्दकः क्षपणः नापि आत्मा गुरवः न भवति ।
आत्मा लिङ्गी एकः नापि ज्ञानी जानाति योगी ।।८८।।
आत्मा वन्दको बौद्धो न भवति, आत्मा क्षपणको दिगम्बरो न भवति, आत्मा
गुरवशब्दवाच्यः श्वेताम्बरो न भवति । आत्मा एकदण्डित्रिदण्डिहंसपरमहंससंज्ञाः संन्यासी शिखी
मुण्डी योगदण्डाक्षमालातिलककुलकघोषप्रभृतिवेषधारी नैकोऽपि कश्चिदपि लिङ्गी न भवति । तर्हि
वह ज्ञानस्वभावरूप जानता है ।।८७।।
आगे वंदक क्षपणक ादि भेद भी जीवके नहीं हैं, ऐसा कहते हैं —
गाथा – ८८
अन्वयार्थ : — [आत्मा ] आत्मा [वन्दकः क्षपणः नापि ] बौद्धका आचार्य नहीं है,
दिगंबर भी नहीं है, [आत्मा ] आत्मा [गुरवः न भवति ] श्वेताम्बर भी नहीं है, [आत्मा ] आत्मा
[एकः अपि ] कोई भी [लिंगी ] वेशका धारी [न ] नहीं है, अर्थात् एकदंडी, त्रिदंडी, हंस,
परमहंस, सन्यासी, जटाधारी, मुंडित, रुद्राक्षकी माला, तिलक, कुलक, घोष वगैरेः भेषोंमें कोई
भी भेषधारी नहीं है, एक [ज्ञानी ] ज्ञानस्वरूप है, उस आत्माको [योगी ] ध्यानी [मुनि ]
ध्यानारूढ़ होकर [जानाति ] जानता है, ध्यान करता है
।
भावार्थ : — यद्यपि व्यवहारनयकर यह आत्मा वंदकादि अनेक भेषोंको धरता है, तो
भी शुद्धनिश्चयनयकर कोई भी भेष जीवके नहीं है, देहके है । यहाँ देहके आश्रयसे जो द्रव्यलिंग
ഹവേ (വംദക, ക്ഷപണാദിക ഭേദ പണ ജീവനാ നഥീ ഏമ കഹേ ഛേ) : —
ഭാവാര്ഥ: — ജോ കേ ആത്മാനേ വ്യവഹാരനയഥീ വംദകാദി ലിംഗീ കഹേവാമാം ആവേ ഛേ തോപണ
ശുദ്ധനിശ്ചയനയഥീ കോഈ പണ ലിംഗ (വേശ) ജീവനേ നഥീ.
അഹീം, ഏ ഭാവാര്ഥ ഛേ കേ ദേഹാശ്രിത ദ്രവ്യലിംഗനേ ഉപചരിത അസദ്ഭൂത വ്യവഹാരനയഥീ ജീവനും
സ്വരൂപ കഹേവാമാം ആവേ ഛേ അനേ വീതരാഗ നിര്വികല്പ സമാധിരൂപ ഭാവലിംഗ ജോ കേ ശുദ്ധാത്മസ്വരൂപനും
൧. स्वशुद्धात्मस्वरूपेण നേ ബദലേ स्वशुद्धात्मस्वरूपेन ഏമ ഹോവംു ജോഈഏ.