Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Malayalam transliteration). Gatha-112 (Adhikar 1).

< Previous Page   Next Page >


Page 182 of 565
PDF/HTML Page 196 of 579

background image
Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
൧൮൨ ]യോഗീന്ദുദേവവിരചിത: [ അധികാര-൧ : ദോഹാ-൧൧൨
११२) जहिँ मइ तहिँ गइ जीव तहुँ मरणु वि जेण लहेहि
तेँ परबंभु मुएवि मइँ मा पर-दव्वि करेहि ।।११२।।
यत्र मतिः तत्र गतिः जीव त्वं मरणमपि येन लभसे
तेन परब्रह्म मुक्त्वा मतिं मा परद्रव्ये कार्षीः ।।११२।।
जहिं मइ तहिं गइ जीव तुहुं मरणु वि जेण लहेहि यत्र मतिस्तत्र गतिः हे जीव
त्वं मरणेन कृत्वा येन कारणेन लभसे तें परबंभु मुएवि मइं मा परदव्वि करेहि तेन कारणेन
परब्रह्मशब्दवाच्यं शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन टङ्कोत्कीर्णज्ञायकैकस्वभावं वीतरागसदानन्दैक-
सुखामृतरसपरिणतं निजशुद्धात्मतत्त्वं मुक्त्वा मतिं चित्तं परद्रव्ये देहसंगादिषु मा कार्षीरिति
तात्पर्यार्थः
।।११२।। एवं सूत्रचतुष्टयेनान्तरस्थले परलोकशब्दव्युत्पत्त्या परलोकशब्दवाच्यस्य
आगे फि र इसी बातको दृढ़ करते हैं
गाथा११२
अन्वयार्थ :[जीव ] हे जीव [यत्र मतिः ] जहाँ तेरी बुद्धि है, [तत्र गतिः ] वहीं
पर गति है, उसको [येन ] जिस कारणसे [त्वं मृत्वा ] तू मरकर [लभसे ] पावेगा, [तेन ]
इसलिये तू [परब्रह्म ] परब्रह्मको [मुक्तवा ] छोड़कर [परद्रव्ये ] परद्रव्यमें [मतिं ] बुद्धिको
[मा कार्षीः ] मत कर
भावार्थ :शुद्ध द्रव्यार्थिकनयकर टाँकीका-सा गढ़ा हुआ अघटितघाट, अमूर्तिक
पदार्थ, ज्ञायकमात्र स्वभाव, वीतराग, सदा आनंदरूप, अद्वितीय अतीन्द्रिय सुखरूप, अमृतके
रसकर तृप्त ऐसे निज शुद्धात्मतत्त्वको छोड़कर द्रव्यकर्म- भावकर्म-नोकर्ममें या देहादि परिग्रहमें
मनको मत लगा
।।११२।।
इसप्रकार पहले महाधिकारमें चार दोहा-सूत्रोंकर अंतरस्थलमें परलोक शब्दका अर्थ
വളീ ഫരീ പണ ആ വാതനേ ദ്രഢ കരേ ഛേ.
ഭാവാര്ഥ:തേഥീ ശുദ്ധ ദ്രവ്യാര്ഥികനയഥീ ‘പരബ്രഹ്മ’ ശബ്ദഥീ വാച്യ, ടംകോത്കീര്ണ ജ്ഞായക ജ
ജേനോ ഏക സ്വഭാവ ഛേ ഏവാ, ഏക (കേവള) വീതരാഗസദാനംദരൂപ സുഖാമൃതരസരൂപേ പരിണമേലാ
നിജശുദ്ധാത്മതത്ത്വനേ ഛോഡീനേ പരദ്രവ്യമാം
- ദേഹസംഗാദിമാംചിത്തനേ ന ജോഡന പ്രവര്താവ, ഏ താത്പയാര്ഥ
ഛേ. ൧൧൨.
ഏ പ്രമാണേ അന്തരസ്ഥളമാം ചാര ഗാഥാസൂത്രോഥീ ‘പരലോക’ ശബ്ദനീ വ്യുത്പത്തിഥീ ‘പരലോക’