Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Malayalam transliteration). Gatha-116 (Adhikar 1).

< Previous Page   Next Page >


Page 187 of 565
PDF/HTML Page 201 of 579

background image
Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
അധികാര-൧ : ദോഹാ-൧൧൬ ]പരമാത്മപ്രകാശ: [ ൧൮൭
विशदाः ।।’’ ।।११५।।
अथ शिवशब्दवाच्ये निजशुद्धात्मनि ध्याते यत्सुखं भवति तत्सूत्रत्रयेण प्रतिपादयति
११६) जं सिवदंसणि परम-सुहु पावहि झाणु करंतु
तं सुहु भुवणि वि अत्थि णवि मेल्लिवि देउ अणंतु ।।११६।।
यत् शिवदर्शने परमसुखं प्राप्नोषि ध्यानं कुर्वन्
तत् सुखं भुवनेऽपि अस्ति नैव मुक्त्वा देवं अनन्तम् ।।११६।।
जमित्यादि पदखण्डनारूपेण व्याख्यानं क्रियतेजं यत् सिवदंसणि स्वशुद्धात्मदर्शने
परमसुहु परमसुखं पावहि प्राप्नोषि हे प्रभाकरभट्ट किं कुर्वन् सन् झाणु करंतु ध्यानं कुर्वन्
सन् तं सुहु तत्पूर्वोक्त सुखं भुवणि वि भुवनेऽपि अत्थि णवि अस्ति नैव किं कृत्वा मेल्लिवि
रागभावसे परस्त्री आदिका चिंतवन करे उस अपध्यानके दो भेद हैं, एक आर्त्त दूसरा रौद्र
सो ये दोनों ही नरक, निगोदके कारण हैं, इसलिये विवेकियोंको त्यागने योग्य हैं ।।११५।।
आगे शिव शब्दसे कहे गये निज शुद्ध आत्माके ध्यान करने पर जो सुख होता है,
उस सुखको तीन दोहा-सूत्रोंमें वर्णन करते हैं
गाथा११६
अन्वयार्थ :[यत् ] जो [ध्यानं कुर्वन् ] ध्यान करता हुआ [शिवदर्शने परमसुखं ]
निज शुद्धात्माके अवलोकनमें अत्यंत सुख [प्राप्नोषि ] हे प्रभाकर, तू पा सकता है, [तत्
सुखं ] वह सुख [भुवने अपि ] तीनलोकमें भी [अनन्तम् देवं मुक्त्वा ] परमात्म द्रव्यके
सिवाय [नैव अस्ति ] नहीं है
भावार्थ :शिव नाम कल्याणका है, सो कल्याणरूप ज्ञानस्वभाव निज शुद्धात्माको
जानो, उसका जो दर्शन अर्थात् अनुभव उसमें सुख होता है, वह सुख परमात्माको छोड़
ജിനശാസനമാം വിചക്ഷണ പുരുഷോ (ജ്ഞാതാ പുരുഷോ) ആര്തധ്യാന കഹേ ഛേ. ൧൧൫.
ഹവേ, ‘ശിവ’ ശബ്ദഥീ വാച്യ ഏവാ നിജശുദ്ധാത്മാനും ധ്യാന കരതാം, ജേ സുഖ ഥായ ഛേ തേനും കഥന
ത്രണ ഗാഥാസൂത്രോഥീ കരേ ഛേ :
ഭാവാര്ഥ:അഹീം, ‘शिव’ ശബ്ദഥീ വിശുദ്ധജ്ഞാനസ്വഭാവവാളോ നിജശുദ്ധാത്മാ ജാണവോ.
വീതരാഗ നിര്വികല്പ ത്രിഗുപ്തിയുക്ത സമാധിനേ കരതോ ഥകോ തും ശിവദര്ശനമാം അര്ഥാത് തേനും ദര്ശന-