Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
൨൮൬ ]യോഗീന്ദുദേവവിരചിത: [ അധികാര-൨ : ദോഹാ-൪൨
रागद्वेषरहितं ज्ञानमिति । तथाहि । निर्मोहनिजशुद्धात्मध्यानेन निर्मोहस्वशुद्धात्मतत्त्वविपरीतं हे जीव
मोहं मुञ्च, येन मोहेन मोहनिमित्तवस्तुना वा निष्कषायपरमात्मतत्त्वविनाशकाः क्रोधादिकषाया
भवन्ति पश्चान्मोहकषायाभावे सति रागादिरहितं विशुद्धज्ञानं लभसे त्वमित्यभिप्रायः । तथा
चोक्त म् — ‘‘तं वत्थुं मुत्तव्वं जं पडि उपज्जए कसायग्गी । तं वत्थुमल्लिएज्जो (तद् वस्तु
अंगीकरोति, इति टिप्पणी) जत्थुवसम्मो कसायाणं ।।’’ ।।४२।।
अथ हेयोपादेयतत्त्वं ज्ञात्वा परमोपशमे स्थित्वा येषां ज्ञानिनां स्वशुद्धात्मनि रतिस्त एव
सुखिन इति कथयति —
१६९) तत्तातत्तु मुणेवि मणि जे थक्का सम – भावि ।
ते पर सुहिया इत्थु जगि जहँ रइ अप्प – सहावि ।।४३।।
രഹിത വിശുദ്ധ ജ്ഞാനനേ പാമീശ ഏവോ അഭിപ്രായ ഛേ. വളീ ഭഗവതീ ആരാധനാ ഗാഥാ ൨൬൨മാം കഹ്യും
പണ ഛേ കേ ‘‘तं वत्थुं मुत्तव्व जं पडि उपज्जए कसायग्गी । तं वत्थुमल्लिएज्जो जत्थुवसम्मो कसायाणं ।।’’
(അര്ഥ: — ജേനാ നിമിത്തഥീ കഷായരൂപീ അഗ്നി ഉത്പന്ന ഥായ ഛേ തേ വസ്തു ഛോഡവീ ജോഈഏ അനേ ജേനാ
നിമിത്തഥീ കഷായോ ഉപശാംത ഥായ ഛേ തേ വസ്തുനോ ആശ്രയ കരവോ ജോഈഏ-തേ വസ്തുനേ അംഗീകാര കരവീ
ജോഈഏ.) ൪൨.
ഹവേ, ഹേയ-ഉപാദേയ തത്ത്വനേ ജാണീനേ പരമ ഉപശമഭാവമാം സ്ഥിത ഥഈനേ ജേ ജ്ഞാനീഓനേ
സ്വശുദ്ധാത്മാമാം രതി ഥഈ തേഓ ജ സുഖീ ഛേ, ഏമ കഹേ ഛേ : —
दूसरी जगह भी कहा है । ‘‘तं वत्थुं’’ इत्यादि । अर्थात् वह वस्तु मन वचन कायसे छोड़नी
चाहिये, कि जिससे कषायरूप अग्नि उत्पन्न हो, तथा उस वस्तुका अंगीकार करना चाहिये,
जिससे कषायें शांत हों । तात्पर्य यह है, कि विषयादिक सब सामग्री और मिथ्यादृष्टि
पापियोंका संग सब तरहसे मोहकषायको उपजाते हैं, इससे ही मनमें कषायरूपी अग्नि
दहकती रहती है । वह सब प्रकारसे छोड़ना चाहिये, और सत्संगति तथा शुभ सामग्री
(कारण) कषायोंको उपशमाती है, — कषायरूपी अग्निको बुझाती है, इसलिये उस संगति
वगैरहको अंगीकार करनी चाहिये ।।४२।।
आगे हेयोपादेय तत्त्वको जानकर परम शांतभावमें स्थित होकर जिनके निःकषायभाव
हुआ और निजशुद्धात्मामें जिनकी लीनता हुई, वे ही ज्ञानी परम सुखी हैं, ऐसा कथन करते
हैं —