Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
൪൦൬ ]യോഗീന്ദുദേവവിരചിത: [ അധികാര-൨ : ദോഹാ-൧൧൧✽൪
मुनयस्तपोधनाः भोयणधार गणि भोजनविषये गृध्रसद्रशान् गणय मन्यस्व जानीहि । इत्थंभूताः
सन्तः णवि परमत्थु मुणंति नैव परमार्थं मन्यन्ते जानन्तीति । अयमत्र भावार्थः ।
गृहस्थानामाहारदानादिकमेव परमो धर्मस्तेनैव सम्यक्त्वपूर्वेण परंपरया मोक्षं लभन्ते कस्मात् स
एव परमो धर्म इति चेत्, निरन्तरविषयकषायाधीनतया आर्तरौद्रध्यानरतानां निश्चयरत्नत्रय-
लक्षणस्य शुद्धोपयोगपरमधर्मस्यावकाशो नास्तीति । शुद्धोपयोगपरमधर्मरतैस्तपोधनैस्त्वन्नपानादि-
विषये मानापमानसमतां कृत्वा यथालाभेन संतोषः कर्तव्य इति ।।१११❃४।।
अथ शुद्धात्मोपलम्भाभावे सति पञ्चेन्द्रियविषयासक्त जीवानां विनाशं दर्शयति —
(ഏ കാരണേ കേ) നിരംതര വിഷയകഷായനേ ആധീന ഹോവാഥീ തേവാ ആര്ത അനേ രൌദ്രധ്യാനമാം രത ജീവോനേ
നിശ്ചയരത്നത്രയസ്വരൂപേ ശുദ്ധോപയോഗരൂപ പരമധര്മനോ തോ അവകാശ നഥീ. (അര്ഥാത് ഗൃഹസ്ഥോനേ
ശുഭോപയോഗനീ ജ മുഖ്യതാ ഛേ.)
ശുദ്ധോപയോഗരൂപ പരമധര്മമാം രത തപോധനോഏ തോ അന്ന-പാനാദി ബാബതമാം മാന-അപമാനമാം
സമതാ ധാരീനേ യഥാലാഭഥീ (ജേ മളേ തേമാം) സംതോഷ കരീ ലേവോ ജോഈഏ — (സംതോഷ രാഖവോ
ജോഈഏ). ൧൧൧❃൪.
ഹവേ, ശുദ്ധാത്മാനീ പ്രാപ്തിനോ അഭാവ ഹോതാം, പാംച ഇന്ദ്രിയനാ വിഷയമാം ആസക്ത ജീവോനോ
വിനാശ ഥായ ഛേ, ഏമ ദര്ശാവേ ഛേ : —
प्रसन्न होते हैं, यदि किसीके घर रस रहित भोजन मिले तो कषाय करते हैं, उस गृहस्थको बुरा
समझते हैं, वे तपोधन नहीं हैं, भोजनके लोलुपी हैं । गृद्धपक्षीके समान हैं । ऐसे लोलुपी यती देहमें
अनुरागी होते हैं, परमात्म - पदार्थको नहीं जानते । गृहस्थोंके तो दानादिक ही बड़े धर्म हैं । जो
सम्यक्त्व सहित दानादि करे, तो परम्परासे मोक्ष पावे । क्योंकि श्रावकका दानादिक ही परमधर्म
है । वह ऐसे हैं, कि ये गृहस्थ – लोग हमेशा विषय कषायके आधीन हैं, इससे इनके आर्त रौद्र ध्यान
उत्पन्न होते रहते हैं, इस कारण निश्चय रत्नत्रयरूप शुद्धोपयोग परमधर्मका तो इनके ठिकाना ही
नहीं है, अर्थात् गृहस्थोंके शुभोपयोगकी ही मुख्यता है । और शुद्धोपयोगी मुनि इनके घर आहार
लेवें, तो इसके समान अन्य क्या ? श्रावकका तो यही बड़ा धरम है, जो कि यती, अर्जिका,
श्रावक, श्राविका इन सबको विनयपूर्वक आहार दे । और यतीका यही धर्म है, अन्न जलादिमें राग
न करे, और मान-अपमानमें समताभाव रक्खे । गृहस्थके घर जो निर्दोष आहारादिक जैसा मिले
वैसा लेवे, चाहे चावल मिले, चाहे अन्य कुछ मिले । जो मिले उसमें हर्ष विषाद न करे । दूध,
दहीं, घी, मिष्टान्न, इनमें इच्छा न करे । यही जिनमार्गमें यतीकी रीति हैं ।।१११❃४।।
आगे शुद्धात्माकी प्राप्तिके अभावमें जो विषयी जीव पाँच इंद्रियोंके विषयोंमें आसक्त
हैं, उनका अकाज (विनाश) होता है, ऐसा दिखलाते हैं —