Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Malayalam transliteration). Gatha-177 (Adhikar 2) Deh Ane Aatmani Bhedbhavana.

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
അധികാര-൨ : ദോഹാ-൧൭൭ ]പരമാത്മപ്രകാശ: [ ൫൦൩
भिण्णउ भिन्नो भवति जिय हे जीव जेम यथा कोऽसौ कर्ता परकिय-भाउ
जपापुष्पाद्युपाधिरूपः परकृतभावः कस्मात्सकाशात् णिम्मल-फ लिहहं निर्मलस्फ टिकात् तेम
तथा भिन्नं मुणि मन्यस्व जानीहि कम् सयलु वि कम्म-सहाउ समस्तमपि भावकर्मद्रव्य-
कर्मनोकर्मस्वभावम् कस्मात् सकाशात् अप्प-सहावहं अनन्तज्ञानादिगुणस्वभावात् परमात्मनः
इति भावार्थः ।।१७६।।
अथ तामेव देहात्मनोर्भेदभावनां द्रढयति
३०८) जेम सहाविं णिम्मलउ फ लिहउ तेम सहाउ
भंतिए मइलु म मण्णि जिय मइलउ देक्खवि काउ ।।१७७।।
यथा स्वभावेन निर्मलः स्फ टिकः तथा स्वभावः
भ्रान्त्या मलिनं मा मन्यस्व जीव मलिनं द्रष्ट्वा कायम् ।।१७७।।
ഭാവാര്ഥ :ജേവീ രീതേ ജപാപുഷ്പാദിനീ ഉപാധിരൂപ പരകൃത ഭാവ നിര്മളസ്ഫടികഥീ ഭിന്ന
ഛേ തേവീ രീതേ സമസ്ത ഭാവകര്മ, ദ്രവ്യകര്മ, നോകര്മസ്വഭാവനേ അനംതജ്ഞാനാദിഗുണ-സ്വഭാവമയ
പരമാത്മാഥീ ഭിന്ന ജാണ, ഏ ഭാവാര്ഥ ഛേ. ൧൭൬.
ഹവേ, തേ ജ ദേഹ അനേ ആത്മാനീ ഭേദഭാവനാ ദ്രഢ കരേ ഛേ (ഹവേ ദേഹ അനേ ആത്മാ ജുദാ
ഛേ, ഏവീ ഭാവനാ കരേ ഛേ) :
[निर्मलस्फ टिकात् ] महा निर्मल स्फ टिकमणिसे [भिन्नः ] जुदे हैं, [तथा ] उसी तरह
[आत्मस्वभावात् ] आत्मस्वभावसे [सकलमपि ] सब [कर्मस्वभावम् ] शुभाशुभ कर्म
[मन्यस्व ] भिन्न जानो
भावार्थ :आत्मस्वभाव महानिर्मल है, भावकर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म ये सब जड़ हैं,
आत्मा चिद्रूप है अनंत ज्ञानादि गुणरूप जो चिदानंद उससे तू सकल प्रपंच भिन्न मान ।।१७६।।
आगे देह और आत्मा जुदेजुदे हैं, यह भेदभावना दृढ़ करते हैं
गाथा१७७
अन्वयार्थ :[यथा ] जैसे [स्फ टिकः ] स्फ टिकमणि [स्वभावेन ] स्वभावसे
[निर्मलः ] निर्मल है, [तथा ] उसीतरह [स्वभावः ] आत्मा ज्ञान दर्शनरूप निर्मल है ऐसे
आत्मस्वभावको [जीव ] हे जीव, [कायम् मलिनं ] शरीरकी मलिनता [दृष्ट्वा ] देखकर
[भ्रांत्या ] भ्रमसे [मलिनं ] मैला [मा मन्यस्व ] मत मान