Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 121 of 565
PDF/HTML Page 135 of 579

background image
Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୬୮ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୨୧
उपयोगोंसे परिणमन करके जीवन, मरण, शुभ, अशुभ, कर्मबंधको करता है, और
शुद्धात्मानुभूतिके प्रगट होने पर शुद्धोपयोगसे परिणत होकर मोक्षको करता है, तो भी शुद्ध
पारिणामिक परमभाव ग्राहक शुद्धद्रव्यार्थिकनयकर न बंधका कर्ता है और न मोक्षका कर्ता
है
ऐसा कथन सुनकर शिष्यने प्रश्न किया, कि हे प्रभो, शुद्धद्रव्यार्थिकस्वरूप
शुद्धनिश्चयनयकर मोक्षका भी कर्ता नहीं है, तो ऐसा समझना चाहिये, कि शुद्धनयकर मोक्ष
ही नहीं है, जब मोक्ष नहीं, तब मोक्षके लिये यत्न करना वृथा है
उसका उत्तर कहते हैं
मोक्ष है, वह बंधपूर्वक है, और बंध है, वह शुद्धनिश्चयनयकर होता ही नहीं, इस कारण बंधके
अभावरूप मोक्ष है, वह भी शुद्धनिश्चयनयकर नहीं है
जो शुद्धनिश्चयनयसे बंध होता, तो हमेशा
बंधा ही रहता, कभी बंधका अभाव न होता इसके बारेमें दृष्टांत कहते हैंकोई एक पुरुष
साँकलसे बँध रहा है, और कोई एक पुरुष बंध रहित हैं, उनमेंसे जो पहले बंधा था, उसको
ଉପଯୋଗରୂପେ ପରିଣମୀନେ ଜନ୍ମ, ମରଣ ଅନେ ଶୁଭ-ଅଶୁଭ ବଂଧନେ କରେ ଛେ, ଅନେ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନୀ
ଅନୁଭୂତିନା ସଦ୍ଭାଵମାଂ ଶୁଦ୍ଧ ଉପଯୋଗରୂପେ ପରିଣମୀନେ ମୋକ୍ଷ ପଣ କରେ ଛେ ତୋପଣ ଶୁଦ୍ଧ ପାରିଣାମିକ
ପରମଭାଵଗ୍ରାହକ ଶୁଦ୍ଧଦ୍ରଵ୍ଯାର୍ଥିକନଯଥୀ ଜନ୍ମମରଣ ଅନେ ବଂଧମୋକ୍ଷନେ କରତୋ ନଥୀ.
ଅହୀଂ, ଶିଷ୍ଯ ପ୍ରଶ୍ନ ପୂଛେ ଛେ :ଜୋ ଶୁଦ୍ଧଦ୍ରଵ୍ଯାର୍ଥିକନଯରୂପ ଶୁଦ୍ଧନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ମୋକ୍ଷନେ କରତୋ
ନଥୀ ତୋ ଶୁଦ୍ଧନଯଥୀ ମୋକ୍ଷ ନଥୀ, ତୋ ପଛୀ ତେନେ ମାଟେ ଅନୁଷ୍ଠାନ କରଵୁଂ ଵୃଥା ଛେ?
ତେନୋ ପରିହାର :ମୋକ୍ଷ ଖରେଖର ବଂଧପୂର୍ଵକ ଛେ ଅନେ ଶୁଦ୍ଧନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ତୋ ତେ ବଂଧ ପଣ
ନଥୀ, ତେ କାରଣେ ବଂଧନା ପ୍ରତିପକ୍ଷଭୂତ ଏଵୋ ମୋକ୍ଷ ତେ ପଣ ଶୁଦ୍ଧନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ନଥୀ. ଵଳୀ ଜୋ
ଶୁଦ୍ଧନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ବଂଧ ହୋଯ ତୋ ସର୍ଵଦା ବଂଧ ଜ ରହେ. ଆ ଵିଷଯନା ସମର୍ଥନମାଂ ଦ୍ରଷ୍ଟାଂତ କହେ ଛେ :
କୋଈ ଏକ ପୁରୁଷ ସାଂକଳଥୀ ବଂଧାଯୋ ଛେ ଅନେ ବୀଜୋ ବଂଧନ ରହିତ ଛେ. ଜେ ବଂଧାଯୋ ଛେ ତେନେ ‘ଛୂଟ୍ଯୋ’
ଏଵୋ ଵ୍ଯଵହାର ଘଟେ ଛେ. ବୀଜା ପୁରୁଷନେ (ଜେ ପହେଲେଥୀ ବଂଧାଯୋ ଜ ନଥୀ ତେନେ) ତମେ ‘ଛୂଟ୍ଯା’ ଏମ ଜୋ
କହେଵାମାଂ ଆଵେ ତୋ ତେ କ୍ରୋଧ କରେ ଛେ, କାରଣ କେ ବଂଧ ନଥୀ ତୋ ପଛୀ ମୋକ୍ଷନୁଂ ଵଚନ କଈ ରୀତେ ଘଟେ? ତେଵୀ
परमार्थेन हे योगिन् जिनवर एवं ब्रूते कथयति तथाहि यद्यप्यात्मा शुद्धात्मानुभूत्यभावे सति
शुभाशुभोपयोगाभ्यां परिणम्य जीवितमरणशुभाशुभबन्धान् करोति शुद्धात्मानुभूतिसद्भावे तु
शुद्धोपयोगेन परिणम्य मोक्षं च करोति तथापि शुद्धपारिणामिकपरमभावग्राहकेण
शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन न करोति
अत्राह शिष्यः यदि शुद्धद्रव्यार्थिकलक्षणेन शुद्धनिश्चयेन मोक्षं
च न करोति तर्हि शुद्धनयेन मोक्षो नास्तीति तदर्थमनुष्ठानं वृथा परिहारमाह मोक्षो हि
बन्धपूर्वकः, स च बन्धः शुद्धनिश्चयेन नास्ति, तेन कारणेन बन्धप्रतिपक्षभूतो मोक्षः सोऽपि
शुद्धनिश्चयेन नास्ति
यदि पुनः शुद्धनिश्चयेन बन्धो भवति तदा सर्वदैव बन्ध एव
अस्मिन्नर्थे द्रष्टान्तमाह एकः कोऽपि पुरुषः शृङ्खलाबद्धस्तिष्ठति द्वितीयस्तु