Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୧୩୬ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୮୦
मिथ्यात्वी जीव वस्तुके स्वरूपको विपरीत जानता है, अपना जो शुद्ध ज्ञानादि सहित स्वरूप
है, उसको मिथ्यात्व रागादिरूप जानता है । उससे क्या करता है ? [कर्मविनिर्मितान् भावान् ]
कर्मोंकर रचे गये शरीरादि परभाव हैं [तान् ] उनको [आत्मानं ] अपने [भणति ] कहता है,
अर्थात् भेदविज्ञानके अभावसे गोरा, श्याम, स्थूल, कृश, इत्यादि कर्मजनित देहके स्वरूपको
अपना जानता है, इसीसे संसारमें भ्रमण करता है । यहाँ पर कर्मोंसे उपार्जन किये भावोंसे भिन्न
जो शुद्ध आत्मा है, उससे जिस समय रागादि दूर होते हैं, उस समय उपादेय है, क्योंकि तभी
शुद्ध आत्माका ज्ञान होता है ।।७९।।
इसके बाद उन पूर्व कथित कर्मजनित भावोंको जिस मिथ्यात्व परिणामसे
बहिरात्मा अपने मानता है, और वे अपने हैं नहीं, ऐसे परिणामोंको पाँच दोहा – सूत्रोंमें
कहते हैं —
कम्मविणिम्मिय भावडा ते अप्पाणु भणेइ कर्मविनिर्मितान् भावान् तानात्मानं भणति,
विशिष्टभेदज्ञानाभावाद्गौरस्थूलकृशादिकर्मजनितदेहधर्मानं जानातीत्यर्थः । अत्र तेभ्यः
कर्मजनितभावेभ्यो भिन्नो रागादिनिवृत्तिकाले स्वशुद्धात्मैवोपादेय इति तात्पर्यार्थः ।।७९।।
अथानन्तरं १तत्पूर्वोक्त कर्मजनितभावान् येन मिथ्यापरिणामेन कृत्वा बहिरात्मा आत्मनि
योजयति तं परिणामं सूत्रपञ्चकेन विवृणोति —
८०) हउँ गोरउ हउँ सामलउ हउँ जि विभिण्णउ वण्णु ।
हउँ तणु-अंगउँ थूलु हउँ एहउँ मूढउ मण्णु ।।८०।।
ଭାଵାର୍ଥ: — ଜୀଵ ମିଥ୍ଯାତ୍ଵରୂପେ ପରିଣମତୋ ତତ୍ତ୍ଵନେ ଵିପରୀତ ଜାଣେ ଛେ-ଶୁଦ୍ଧଆତ୍ମାନୀ
ଅନୁଭୂତିନୀ ରୁଚିଥୀ ଵିଲକ୍ଷଣ ମିଥ୍ଯାତ୍ଵରୂପେ ପରିଣମତୋ ଥକୋ ଜୀଵ ପରମାତ୍ମାଦି ତତ୍ତ୍ଵନେ ଅନେ ଯଥାଵତ୍
ଵସ୍ତୁସ୍ଵରୂପନେ ପଣ ଵିପରୀତ ଅନେ ରାଗାଦିରୂପେ ପରିଣମେଲୁଂ ଜାଣେ ଛେ, କେ ଜେଥୀ ତେ କର୍ମଥୀ ବନେଲା ଭାଵୋନେ
ପୋତାରୂପ କହେ ଛେ – ଵିଶିଷ୍ଟ ଭେଦଜ୍ଞାନନା ଅଭାଵଥୀ ଗୋରୋ, ସ୍ଥୂଳ, କୃଶାଦି ଏଵା କର୍ମଜନିତ ଦେହନା
ଧର୍ମୋନେ ପୋତାରୂପ ଜାଣେ ଛେ.
ଅହୀଂ, ତେ କର୍ମଜନିତ ଭାଵୋଥୀ ଭିନ୍ନ ରାଗାଦିନୀ ନିଵୃତ୍ତିନା ସମଯେ ସ୍ଵଶୁଦ୍ଧାତ୍ମା ଜ ଉପାଦେଯ
ଛେ, ଏଵୋ ତାତ୍ପଯାର୍ଥ ଛେ. ୭୯.
ତ୍ଯାର ପଛୀ ତେ ପୂର୍ଵୋକ୍ତ କର୍ମଜନିତ ଭାଵୋନେ ଜେ ମିଥ୍ଯାତ୍ଵନା ପରିଣାମେ କରୀନେ ବହିରାତ୍ମା
ପୋତାମାଂ ଜୋଡେ ଛେ ତେ ପରିଣାମନୁଂ, ପାଂଚ ଗାଥାସୂତ୍ରୋଥୀ, କଥନ କରେ ଛେ : —
୧. ପାଠାନ୍ତର : — तत् = तान्