Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-82 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୮୨ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୩୯
८२) तरुणउ बूढउ रूयडउ सूरउ पंडिउ दिव्वु
खवणउ वंदउ सेवडउ मूढउ मण्णइ सव्वु ।।८२।।
तरुणः वृद्धः रूपवान् शूरः पण्डितः दिव्यः
क्षपणकः वन्दकः श्वेतपटः मूढः मन्यते सर्वम् ।।८२।।
तरुणउ बूढउ रूयडउ सूरउ पंडिउ दिव्वु तरुणो यौवनस्थोऽहं वृद्धोऽहं रूपस्व्यहं शूरः
सुभटोऽहं पण्डितोऽहं दिव्योऽहम् पुनश्च किंविशिष्टः खवणउ वंदउ सेवडउ क्षपणको
दिगम्बरोऽहं वन्दको बौद्धोऽहं श्वेतपटादिलिङ्गधारकोऽहमिति मूढात्मा सर्वं मन्यत इति अयमत्र
तात्पर्यार्थः यद्यपि व्यवहारेणाभिन्नान् तथापि निश्चयेन वीतरागसहजानन्दैकस्वभावात्परमात्मनः
भिन्नान् कर्मोदयोत्पन्नान् तरुणवृद्धादिविभावपर्यायान् हेयानपि साक्षादुपादेयभूते स्वशुद्धात्मतत्त्वे
योजयति
कोऽसौ ख्यातिपूजालाभादिविभावपरिणामाधीनतया परमात्मभावनाच्युतः सन्
मूढात्मेति ।।८२।। अथ
ଭାଵାର୍ଥ:ଖ୍ଯାତି, ପୂଜା, ଲାଭାଦି ଵିଭାଵ ପରିଣାମନେ ଆଧୀନ ଥଈନେ,
ପରମାତ୍ମଭାଵନାଥୀ ଚ୍ଯୁତ ଥତୋ ମୂଢାତ୍ମା ଜୋ କେ ଜେଓ ଵ୍ଯଵହାରଥୀ ଅଭିନ୍ନ ଛେ ତୋପଣ ନିଶ୍ଚଯଥୀ
ଵୀତରାଗସହଜାନଂଦ ଜେନୋ ଏକ ସ୍ଵଭାଵ ଛେ ଏଵା ପରମାତ୍ମାଥୀ ଭିନ୍ନ ଛେ. କର୍ମୋଦଯଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ
ତରୁଣ, ଵୃଦ୍ଧାଦି ଵିଭାଵପର୍ଯାଯୋ ହେଯ ହୋଵା ଛତାଂ ପଣ ତେମନେ, ସାକ୍ଷାତ୍ ଉପାଦେଯଭୂତ
ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମତତ୍ତ୍ଵମାଂ ଯୋଜେ ଛେ (
ଜୋଡେ ଛେ, ସଂବଂଧ କରେ ଛେ.) ଅହୀଂ ଆ ତାତ୍ପଯାର୍ଥ ଛେ. ୮୨.
गाथा८२
अन्वयार्थ :[तरुणः ] मैं जवान हूँ, [वृद्धः ] बुड्ढा हूँ, [रूपस्वी ] रूपवान हूँ,
[शूरः ] शूरवीर हूँ, [पण्डितः ] पंडित हूँ [दिव्यः ] सबमें श्रेष्ठ हूँ [क्षपणकः ] दिगंबर हूँ,
[वन्दकः ] बोद्धमतका आचार्य हूँ [श्वेतपटः ] और मैं श्वेताम्बर हूँ, इत्यादि [सर्वम् ] सब
शरीरके भेदोंको [मूढ़ः ] मूर्ख [मन्यते ] अपना मानता है
ये भेद जीवके नहीं हैं
भावार्थ :यहाँ पर यह है कि, यद्यपि व्यवहारनयकर ये सब तरुण वृद्धादि शरीरके
भेद आत्माके कहे जाते हैं, तो भी निश्चयनयकर वीतराग सहजानंद एक स्वभाव जो परमात्मा
उससे भिन्न हैं
ये तरुणादि विभावपर्याय कर्मके उदयकर उत्पन्न हुए हैं, इसलिये त्यागने योग्य
हैं, तो भी उनको साक्षात् उपादेयरूप निज शुद्धात्म तत्त्वमें जो जो लगाता है, अर्थात् मानता
है, वह अज्ञानी जीव बड़ाई, प्रतिष्ठा, धनका लाभ इत्यादि विभाव परिणामोंके आधीन होकर
परमात्माकी भावनासे रहित हुआ मूढात्मा हैं, वह जीवके ही भाव मानता है
।।८२।।