Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-85 (Adhikar 1) Samyakdrashtini Bhavana.

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୧୪୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୮୫
करोति, अपि तु सर्वं करोत्येवेति अत्र तात्पर्यम् मिथ्याद्रष्टिर्जीवो वीतरागनिर्विकल्प-
समाधिसमुत्पन्नपरमानन्दपरमसमरसीभावरूपसुखरसापेक्षया निश्चयेन दुःखरूपानपि विषयान्
सुखहेतून् मत्वा अनुभवतीत्यर्थः
।।८४।। एवं त्रिविधात्मप्रतिपादकप्रथममहाधिकारमध्ये ‘पज्जय
रत्तउ जीवडउ’ इत्यादिसूत्राष्टकेन मिथ्याद्रष्टिपरिणतिव्याख्यानस्थलं समाप्तम् ।।
तदनन्तरं सम्यग्द्रष्टिभावनाव्याख्यानमुख्यत्वेन ‘कालु लहेविणु’ इत्यादि सूत्राष्टकं
कथ्यते अथ
८५) कालु लहेविणु जोइया जिमु जिमु मोहु गलेइ
तिमु तिमु दंसणु लहइ जिउ णियमेँ अप्पु मुणेइ ।।८५।।
कालं लब्ध्वा योगिन् यथा यथा मोहः गलति
तथा तथा दर्शनं लभते जीवः नियमेन आत्मानं मनुते ।।८५।।
समझकर सेवन करता है, सो इनमें सुख नहीं हैं ।।८४।।
इसप्रकार तीन तरहकी आत्माको कहनेवाले पहले महाधिकारमें ‘‘जिउ मिच्छतें इत्यादि
आठ दोहोंमेंसे मिथ्यादृष्टिकी परिणतिका व्याख्यान समाप्त किया इसके आगे सम्यग्दृष्टिकी
भावनाके व्याख्यानकी मुख्यतासे ‘‘काल लहेविणु’’ इत्यादि आठ दोहा-सूत्र कहते हैं
गाथा८५
अन्वयार्थ :[योगिन् ] हे योगी, [कालं लब्धवा ] काल पाकर [यथा यथा ] जैसा
जैसा [मोहः ] मोह [गलति ] गलता है-कम होता जाता है, [तथा तथा ] तैसा तैसा [जीवः ]
यह जीव [दर्शनं ] सम्यग्दर्शनको [लभते ] पाता है, फि र [नियमेन ] निश्चयसे [आत्मानं ]
अपने स्वरूपको [मनुते ] जानता है
ପରମସମରସୀ ଭାଵରୂପ ସୁଖରସନୀ ଅପେକ୍ଷାଏ ନିଶ୍ଚଯଥୀ ଦୁଃଖରୂପ ଵିଷଯୋନେ ପଣ ସୁଖନା ହେତୁ ମାନୀନେ
ଅନୁଭଵେ ଛେ, ଏ ତାତ୍ପଯାର୍ଥ ଛେ. ୮୪.
ଏ ପ୍ରମାଣେ ତ୍ରଣ ପ୍ରକାରନା ଆତ୍ମାନା ପ୍ରତିପାଦକ ପ୍ରଥମ ମହାଧିକାରମାଂ ‘पज्जयरत्तउ जीवडउ’
ଇତ୍ଯାଦି ଆଠ ସୂତ୍ରୋଥୀ ମିଥ୍ଯାଦ୍ରଷ୍ଟିନୀ ପରିଣତିନୁଂ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନସ୍ଥଳ ସମାପ୍ତ ଥଯୁଂ.
ତ୍ଯାର ପଛୀ ସମ୍ଯଗ୍ଦ୍ରଷ୍ଟିନୀ ଭାଵନାନା ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ‘कालु लहेविणु’ ଇତ୍ଯାଦି ଆଠ
ଗାଥାସୂତ୍ର କହେ ଛେ.
ହଵେ (ସମ୍ଯଗ୍ଦ୍ରଷ୍ଟି ଜୀଵନୁଂ କଥନ କରେ ଛେ) :