Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୧୫୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୯୨
आत्मा पण्डितः मूर्खः नैव नैव ईश्वरः नैव निःस्वः ।
तरुणः वृद्धः बालः नैव अन्यः अपि कर्मविशेषः ।।९१।।
अप्पा पंडिउ मुक्खु णवि णवि ईसरु णवि णीसु तरुणउ बूढउ बालु णवि आत्मा
पण्डितो न भवति मूर्खो नैव ईश्वरः समर्थो नैव निःस्वो दरिद्रः तरुणो वृद्धो बालोऽपि नैव ।
पण्डितादिस्वरूपं यद्यात्मस्वभावो न भवति तर्हि किं भवति । अण्णु वि कम्मविसेसु अन्य एव
कर्मजनितोऽयं विभावपर्यायविशेष इति । तद्यथा । पण्डितादिसंबन्धान् यद्यपि व्यवहारनयेन
जीवस्वभावान् तथापि शुद्धनिश्चयनयेन शुद्धात्मद्रव्याद्भिन्नान् सर्वप्रकारेण हेयभूतान्
वीतरागस्वसंवेदनज्ञानभावनारहितोऽपि बहिरात्मा स्वस्मिन्नियोजयति तानेव पण्डितादि-
विभावपर्यायांस्तद्विपरीतो योऽसौ चान्तरात्मा परस्मिन् कर्माणि नियोजयतीति तात्पर्यार्थः ।।९१।।
अथ —
९२) पुण्णु वि पाउ वि कालु णहु धम्माधम्मु वि काउ ।
एक्कु वि अप्पा होइ णवि मेल्लिवि चेयण – भाउ ।।९२।।
भावार्थ : — यद्यपि शरीरके सम्बन्धसे पंडित वगैरह भेद व्यवहारनयसे जीवके कहे
जाते हैं, तो भी शुद्धनिश्चयनयकर शुद्धात्मद्रव्यसे भिन्न हैं, और सर्वथा त्यागने योग्य हैं । इन
भेदोंको वीतरागस्वसंवेदनज्ञानकी भावनासे रहित मिथ्यादृष्टि जीव अपने जानता है, और इन्हींको
पंडितादि विभावपर्यायोंको अज्ञानसे रहित सम्यग्दृष्टि जीव अपनेसे जुदे कर्मजनित जानता
है ।।९१।।
आगे आत्माका चेतनभाव वर्णन करते हैं —
ଜୋ ପଂଡିତାଦିସ୍ଵରୂପ ଆତ୍ମାନୋ ସ୍ଵଭାଵ ନଥୀ ତୋ ତେ ଶୁଂ ଛେ? [अन्यः अपि कर्म विशेषः]
ପଂଡିତାଦି ସ୍ଵରୂପ ଆତ୍ମାଥୀ ଭିନ୍ନ କର୍ମଵିଶେଷ ଛେ – ଅର୍ଥାତ୍ କର୍ମଜନିତ ଵିଭାଵ ପର୍ଯାଯ ଵିଶେଷ ଛେ.
ଭାଵାର୍ଥ: — ଵୀତରାଗସ୍ଵସଂଵେଦନରୂପ ଜ୍ଞାନନୀ ଭାଵନାଥୀ ରହିତ ଏଵୋ ବହିରାତ୍ମା,
ପଂଡିତାଦି ସଂବଂଧୋ ଜୋ କେ ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ ଜୀଵନା ସ୍ଵଭାଵୋ ଛେ ତୋପଣ ଶୁଦ୍ଧନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ
ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯଥୀ ଭିନ୍ନ ଅନେ ସର୍ଵପ୍ରକାରେ ହେଯଭୂତ ଛେ ତେମନେ ପୋତାମାଂ ଯୋଜେ ଛେ – ଜୋଡେ ଛେ ଅନେ ତେନାଥୀ
ଵିପରୀତ ଜେ ଅନ୍ତରାତ୍ମା ଛେ ତେ, ତେ ଜ ପଂଡିତାଦି ଵିଭାଵପର୍ଯାଯୋନେ ପର ଏଵା କର୍ମମାଂ ଯୋଜେ ଛେ.
(ତେମନେ ପୋତାଥୀ ଜୁଦା କର୍ମଜନିତ ଜାଣେ ଛେ.) ଏ ତାତ୍ପଯାର୍ଥ ଛେ. ୯୧.
ହଵେ (ଆତ୍ମାନା ଚେତନଭାଵନୁଂ ଵର୍ଣନ କରେ ଛେ) : —