Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-99 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୧୬୪ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୯୯
९९) जोइय अप्पेँ जाणिएण जगु जाणियउ हवेइ
अप्पहँ केरइ भावडइ बिंबिउ जेण वसेइ ।।९९।।
योगिन् आत्मना ज्ञातेन जगत् ज्ञातं भवति
आत्मनः संबन्धिनिर्भावे बिम्बितं येन वसति ।।९९।।
जोइय अप्पे जाणिएण हे योगिन् आत्मना ज्ञातेन किं भवति जगु जाणियउ हवेइ
जगत्त्रिभुवनं ज्ञातं भवति कस्मात् अप्पहं केरइ भावडइ बिंबिउ जेण बसेइ आत्मनः
संबन्धिनि भावे केवलज्ञानपर्याये बिम्बितं प्रतिबिम्बितं येन कारणेन वसति तिष्ठतीति
अयमर्थः वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानेन परमात्मतत्त्वे ज्ञाते सति समस्तद्वादशाङ्गागमस्वरूपं
ज्ञातं भवति कस्मात् यस्माद्राघवपाण्डवादयो महापुरुषा जिनदीक्षां गृहीत्वा द्वादशाङ्गं पठित्वा
गाथा९९
अन्वयार्थ :[योगिन् ] हे योगी [आत्मना ज्ञातेन ] एक अपने आत्माके जाननेसे
[जगत् ज्ञातं भवति ] यह तीन लोक जाना जाता है, [येन ] क्योंकि [आत्मनः संबन्धिनि भावे ]
आत्माके भावरूप केवलज्ञानमें [बिम्बितं ] यह लोक प्रतिबिम्बित हुआ [वसति ] बस रहा हैं
भावार्थ :वीतराग निर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानसे शुद्धात्मतत्त्वके जानने पर समस्त
द्वादशांग शास्त्र जाना जाता है क्योंकि जैसे रामचन्द्र, पांडव, भरत, सगर आदि महान् पुरुष
भी जिनराजकी दीक्षा लेकर फि र द्वादशांगक ो पढ़कर द्वादशांग पढ़नेका फ ल निश्चयरत्नत्रय-
स्वरूप जो शुद्धपरमात्मा उसके ध्यानमें लीन हुए तिष्ठे थे
इसलिये वीतरागस्वसंवेदनज्ञानकर
अपने आत्माका जानना ही सार है, आत्माके जाननेसे सबका जानपना सफ ल होता है, इस
कारण जिन्होंने अपनी आत्मा जानी उन्होंने सबको जाना
अथवा निर्विकल्पसमाधिसे उत्पन्न
ଭାଵାର୍ଥ:ଵୀତରାଗ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସ୍ଵସଂଵେଦନରୂପ ଜ୍ଞାନ ଵଡେ ପରମାତ୍ମତତ୍ତ୍ଵ ଜାଣତାଂ, ସମସ୍ତ
ବାର ଅଂଗନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ଜଣାଯୁଂ, କାରଣ କେ (୧) ଜେଥୀ ରାମ, ପାଂଡଵ ଆଦି ମହାପୁରୁଷୋ ଜିନଦୀକ୍ଷା ଲଈନେ
ବାର ଅଂଗ ଭଣୀନେ ବାର ଅଂଗନା ଅଧ୍ଯଯନନା ଫଳରୂପ, ନିଶ୍ଚଯରତ୍ନତ୍ରଯାତ୍ମକ ପରମାତ୍ମଧ୍ଯାନମାଂ ଲୀନ
ରହେ ଛେ ତେଥୀ ଵୀତରାଗ ସ୍ଵସଂଵେଦନରୂପ ଜ୍ଞାନ ଵଡେ ନିଜ ଆତ୍ମାନେ ଜାଣତାଂ ସର୍ଵ ଜଣାଯୁଂ ଛେ. (୨) ଅଥଵା
ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧିଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ପରମାନଂଦରୂପ ସୁଖରସନୋ ଆସ୍ଵାଦ ଉତ୍ପନ୍ନ ଥତାଂ ଜ, ପୁରୁଷ ଏମ ଜାଣେ
କେ ‘‘ମାରୁଂ ସ୍ଵରୂପ ଅନ୍ଯ ଛେ, ଦେହ-ରାଗାଦି ପର ଛେ’’ ତେଥୀ ଆତ୍ମାନେ ଜାଣତାଂ, ସର୍ଵ ଜଣାଯୁଂ. (୩) ଅଥଵା
କର୍ତାରୂପ ଆତ୍ମା କରଣଭୂତ ଶ୍ରୁତଜ୍ଞାନରୂପ ଵ୍ଯାପ୍ତିଜ୍ଞାନଥୀ ସର୍ଵ ଲୋକାଲୋକନେ ଜାଣେ ଛେ ତେଥୀ ଆତ୍ମାନେ
ଜାଣତାଂ ସର୍ଵ ଜଣାଯୁଂ. (୪) ଅଥଵା କେଵଳଜ୍ଞାନନୀ ଉତ୍ପତ୍ତିନା ବୀଜରୂପ ଵୀତରାଗ, ନିର୍ଵିକଲ୍ପ