Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୧୭୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୧୦୪
अप्पु वि परु वि वियाणियइ जें अप्पें मुणिएण आत्मापि परोऽपि विज्ञायते येन
आत्मना विज्ञातेन सो णिय अप्पा जाणि तुहुं तं निजात्मानं जानीहि त्वम् । जोइय णाणबलेण
हे योगिन्, केन कृत्वा जानीहि । ज्ञानबलेनेति । अयमत्रार्थः । वीतरागसदानन्दैकस्वभावेन
येनात्मना ज्ञातेन स्वात्मा परोऽपि ज्ञायते तमात्मानं वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानभावना-
समुत्पन्नपरमानन्दसुखरसास्वादेन जानीहि तन्मयो भूत्वा सम्यगनुभवेति भावार्थः ।।१०३।।
अतः कारणात् ज्ञानं पृच्छति —
१०४) णाणु पयासहि परमु महु किं अण्णेँ बहुएण ।
जेण णियप्पा जाणियइ सामिय एक्क-खणेण ।।१०४।।
ज्ञानं प्रकाशय परमं मम किं अन्येन बहुना ।
येन निजात्मा ज्ञायते स्वामिन् एकक्षणेन ।।१०४।।
भावार्थ : — यहाँ पर यह है, कि रागादि विकल्प-जालसे रहित सदा आनंद स्वभाव
जो निज आत्मा उसके जाननेसे निज और पर सब जाने जाते हैं, इसलिये हे योगी, हे ध्यानी,
तू उस आत्माको वीतराग निर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानकी भावनासे उत्पन्न परमानंद सुखरसके
आस्वादसे जान, अर्थात् तन्मयी होकर अनुभव कर । स्वसंवेदन ज्ञान (आपकर अपनेके अनुभव
करना) ही सार है । ऐसा उपदेश श्री योगीन्द्रदेवने प्रभाकरभट्टको दिया ।।१०३।।
अब प्रभाकरभट्ट महान् विनयसे ज्ञानका स्वरूप पूछता है —
गाथा – १०४
अन्वयार्थ : — [स्वामिन् ] हे भगवान् [येन ज्ञानेन ] जिस ज्ञानसे [एकक्षणेन ]
क्षणभरमें [निजात्मा ] अपनी आत्मा [ज्ञायते ] जानी जाती है, वह [परमं ज्ञानं ] परम ज्ञान
[मम ] मेरे [प्रकाशय ] प्रकाशित करो, [अन्येन बहुना ] और बहुत विकल्प-जालोंसे [किं ]
क्या फ ायदा ? कुछ भी नहीं ।
ଭାଵାର୍ଥ: — ଵୀତରାଗ ସଦାନଂଦ ଜ ଜେନୋ ଏକ ସ୍ଵଭାଵ ଛେ ଏଵା ଜେ ଆତ୍ମାନେ ଜାଣତାଂ,
ସ୍ଵାତ୍ମା ଅନେ ପର ପଣ ଜଣାଯ ଛେ ତେ ଆତ୍ମାନେ ଵୀତରାଗନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସ୍ଵସଂଵେଦନରୂପ ଜ୍ଞାନନୀ ଭାଵନାଥୀ
ଉତ୍ପନ୍ନ ପରମାନଂଦରୂପ ସୁଖରସନା ଆସ୍ଵାଦ ଵଡେ ତୁଂ ଜାଣ-ତନ୍ମଯ ଥଈନେ ସମ୍ଯଗ୍ ଅନୁଭଵ ଏ ଭାଵାର୍ଥ
ଛେ. ୧୦୩.
ଏ କାରଣେ ପ୍ରଭାକରଭଟ୍ଟ (ମହାଵିନଯଥୀ) ଜ୍ଞାନନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ପୂଛେ ଛେ : —