Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୧୦୯ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୭୭
कथंभूतो निजात्मा । णाणिउ ज्ञानी ज्ञानलक्षणः तमित्थंभूतमात्मानं जा ण मुणेहि यावत्कालं
न जानासि ता अण्णाणिं णाणमउं तावत्कालमज्ञानेन मिथ्यात्वरागादिविकल्पजालेन ज्ञानमयम् ।
किं पर बंभु लहेहि किं परमुत्कृष्टं ब्रह्मस्वभावं लभसे किं तु नैवेति । तद्यथा । यावत्कालमात्मा
कर्ता आत्मानं कर्मतापन्नम् आत्मना करणभूतेन आत्मने निमित्तं आत्मनः सकाशात् आत्मनि
स्थितं समस्तरागादिविकल्पजालं मुक्त्वा न जानासि तावत्कालं परमब्रह्मशब्दवाच्यं
निर्दोषिपरमात्मानं किं लभसे नैवेति भावार्थः ।।१०८।। इति सूत्रचतुष्टयेनान्तरस्थले
ज्ञानव्याख्यानं गतम् ।
अथानन्तरं सूत्रचतुष्टयेनान्तरस्थले परलोकशब्दव्युत्पत्त्या परलोकशब्दवाच्यं परमात्मानं
कथयति —
१०९) जोइज्जइ तिं बंभु परु जाणिज्जइ तिं सोइ ।
बंभु मुणेविणु जेण लहु गम्मिज्जइ परलोइ ।।१०९।।
द्रश्यते तेन ब्रह्मा परः ज्ञायते तेन स एव ।
ब्रह्म मत्वा येन लघु गम्यते परलोके ।।१०९।।
तिष्ठता नहीं जान ले, तब तक निर्दोष शुद्ध परमात्मा सिद्धपरमेष्ठीको क्या पा सकता है ? कभी
नहीं पा सकता । जो आत्माको जानता है, वही परमात्माको जानता है ।।१०८।।
इसप्रकार प्रथम महास्थलमें चार दोहोंमें अंतरस्थलमें ज्ञानका व्याख्यान किया । आगे
चार सूत्रोंमें अंतरस्थलमें परलोक शब्दकी व्युत्पत्तिकर परलोक शब्दसे परमात्माको ही कहते
हैं —
गाथा – १०९
अन्वयार्थ : — [तेन ] उस कारणसे उसी पुरुषसे [परः ब्रह्मा ] शुद्धात्मा नियमसे
ଆତ୍ମାନେ ମାଟେ, ଆତ୍ମାଥୀ, ଆତ୍ମାମାଂ ସ୍ଥିତ ଥଈନେ ସମସ୍ତ ରାଗାଦି ଵିକଲ୍ପଜାଳନେ ଛୋଡୀନେ
ଜାଣତୋ ନଥୀ; ତ୍ଯାଂ ସୁଧୀ ‘ପରବ୍ରହ୍ମ’ ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵା ନିର୍ଦୋଷ ପରମାତ୍ମାନେ ଶୁଂ ପାମୀ ଶକେ?
ନ ପାମୀ ଶକେ, ଏ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୧୦୮.
ଏ ରୀତେ ପ୍ରଥମ ମହାସ୍ଥଳମାଂ ଚାର ଦୋହକ ସୂତ୍ରୋଥୀ ଅନ୍ତରସ୍ଥଳମାଂ ଜ୍ଞାନନୁଂ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ ସମାପ୍ତ
ଥଯୁଂ.
ତ୍ଯାର ପଛୀ ଅନ୍ତରସ୍ଥଳମାଂ ଚାର ଗାଥା ସୂତ୍ରୋଥୀ ପରଲୋକ ଶବ୍ଦନୀ ଵ୍ଯୁତ୍ପତ୍ତି ଅନୁସାର ପରଲୋକ
ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ପରମାତ୍ମାନୁଂ କଥନ କରେ ଛେ : —