Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୧୧୦ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୭୯
मुक्त ात्मा लोकाग्रे तिष्ठति स एव ब्रह्मलोकः स एव विष्णुलोकः स एव शिवलोको नान्यः
कोऽपीति भावार्थः ।।१०९।। अथ —
११०) मुणि-वर-विंदहँ हरि-हरहं जो मणि णिवसइ देउ ।
परहँ जि परतरु णाणमउ सो वुच्चइ पर-लोउ ।।११०।।
मुनिवरवृन्दानां हरिहराणां यः मनसि निवसति देवः ।
परस्माद् अपि परतरः ज्ञानमयः स उच्यते परलोकः ।।११०।।
मुणिवरविंदहं हरिहरहं मुनिवरवृन्दानां हरिहराणां च जो मणि णिवसइ देउ योऽसौ
मनसि निवसति देवः आराध्यः । पुनरपि किंविशिष्टः । परहं जि परतरु णाणमउ
परस्मादुत्कृष्टादपि अथवा परहं जि बहुवचनं परेभ्योऽपि सकाशादतिशयेन परः परतरः ।
कोई भी ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, शिवलोक नहीं है , ये सब निर्वाणक्षेत्रके नाम हैं, और ब्रह्मा,
विष्णु, शिव ये सब सिद्धपरमेष्ठीके नाम हैं । भगवान् तो व्यक्तिरूप परमात्मा हैं, तथा वह जीव
शक्तिरूप परमात्मा है । इसमें संदेह नहीं है । जितने भगवान्के नाम हैं, उतने सब शक्तिरूप
इस जीवके नाम हैं । यह जीव ही शुद्धनयकर भगवान् है ।।१०९।।
आगे ऐसा कहते हैं कि भगवान्का ही नाम परलोक है —
गाथा – ११०
अन्वयार्थ : — [यः ] जो आत्मदेव [मुनिवरवृन्दानां हरिहराणां ] मुनिश्वरोंके समूहके
तथा इन्द्र वा वासुदेव रुद्रोंके [मनसि ] चित्तमें [निवसति ] बस रहा है, [सः ] वह [परस्माद्
अपि परतरः ] उत्कृष्टसे भी उत्कृष्ट [ज्ञानमयः ] ज्ञानमयी [परलोकः ] परलोक [उच्यते ]
कहा जाता है ।
भावार्थ : — परलोक शब्दका अर्थ ऐसा है कि पर अर्था त् उत्कृष्ट वीतराग चिदानंद
शुद्ध स्वभाव आत्मा उसका लोक अर्थात् अवलोकन निर्विकल्पसमाधिमें अनुभवना वह
ଅହୀଂ, ଆ ଅର୍ଥ ଛେ କେ ମୁକ୍ତାତ୍ମା ଜେ ଲୋକନା ଅଗ୍ରଭାଗମାଂ ବିରାଜେ ଛେ ତେ ଜ ବ୍ରହ୍ମଲୋକ
ଛେ, ତେ ଜ ଵିଷ୍ଣୁଲୋକ ଛେ, ତେ ଜ ଶିଵଲୋକ ଛେ, ବୀଜୋ କୋଈ ପଣ ନହି, ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୧୦୯.
ହଵେ, ପରମାତ୍ମା ପରଲୋକ ଛେ, ଏମ କହେ ଛେ : —
ଭାଵାର୍ଥ: — ପର ଅର୍ଥାତ୍ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ଵୀତରାଗ ଚିଦାନଂଦ ଜେନୋ ଏକ ସ୍ଵଭାଵ ଛେ ଏଵୋ ଆତ୍ମା
ତେନୋ ଲୋକ ଅର୍ଥାତ୍ ତେନୁଂ ଅଵଲୋକନ ଅଥଵା ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧିମାଂ ତେନୁଂ ଅନୁଭଵନ ଏଵୋ ‘ପରଲୋକ’