Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-115 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୧୧୫ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୮୫
कट्ठगिरी अग्निकणिका यथा काष्ठगिरिं दहति तथा डहइ असेसु वि पाउ दहत्यशेष पापमिति
तथाहिऋद्धिगौरवरसगौरवकवित्ववादित्वगमकत्ववाग्मित्वचतुर्विधशब्दगौरवस्वरूपप्रभृतिसमस्त-
विकल्पजालत्यागरूपेण महावातेन प्रज्वलिता निजशुद्धात्मतत्त्वध्यानाग्निकणिका
स्तोकाग्निकेन्धनराशिमिवान्तर्मुहूर्तेनापि चिरसंचितकर्मराशिं दहतीति अत्रैवंविधं शुद्धात्मध्यान-
सामर्थ्यं ज्ञात्वा तदेव निरन्तरं भावनीयमिति भावार्थः ।।११४।।
अथ हे जीव चिन्ताजालं मुक्त्वा शुद्धात्मस्वरूपं निरन्तरं पश्येति निरूपयति
११५) मेल्लिवि सयल अवक्खडी जिय णिच्चिंतउ होइ
चित्तु णिवेसहि परमपए देउ णिरंजणु जोइ ।।११५।।
मद, शास्त्रकी टीका बनानेका मद, शास्त्रके व्याख्यान करनेका मद, ये चार तरहका
शब्द-गौरव-स्वरूप इत्यादि अनेक विकल्प-जालोंका त्यागरूप प्रचंड पवन उससे
प्रज्वलित हुई (दहकती हुई) जो निज शुद्धात्मतत्त्वके ध्यानरूप अग्निकी कणी है, जैसे
वह अग्निकी कणी काठके पर्वतको भस्म कर देती है, उसी तरह यह समस्त पापोंको
भस्म कर डालती है, अर्थात् जन्म-जन्मके इकट्ठे किये हुए कर्मोंको आधे निमेषमें नष्ट
कर देती है, ऐसी शुद्ध आत्म-ध्यानकी सामर्थ्य जानकर उसी ध्यानकी ही भावना सदा
करनी चाहिये
।।११४।।
आगे हे जीव, चिंताओंको छोड़कर शुद्धात्मस्वरूपको निरंतर देख, ऐसा कहते हैं
ଭସ୍ମ କରଵାନୋ ମଦ, ଅଥଵା ନଵ ରସ ଜାଣଵାନୋ ମଦ) ଅନେ କଵିକଳାନୋ ମଦ, ଵାଦମାଂ ଜୀତଵାନୋ
ମଦ, ଶାସ୍ତ୍ରନୀ ଟୀକା ବନାଵଵାନୋ ମଦ, ଶାସ୍ତ୍ରନୁଂ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ କରଵାନୋ ମଦ ଆ ଚାର ଶବ୍ଦଗୌରଵ
ଗର୍ଵାଦିସ୍ଵରୂପଥୀ ମାଂଡୀନେ ସମସ୍ତ ଵିକଲ୍ପଜାଳୋନା ତ୍ଯାଗରୂପ ପ୍ରଚଂଡ ପଵନଥୀ ପ୍ରଜ୍ଵଲିତ ନିଜ ଶୁଦ୍ଧ
ଆତ୍ମତତ୍ତ୍ଵନା ଧ୍ଯାନରୂପ ଅଗ୍ନିକଣିକା, ଜେଵୀ ରୀତେ ଅଗ୍ନିନୀ ନାନୀ କଣୀ ଇନ୍ଧନନା ପହାଡନେ ଭସ୍ମିଭୂତ
କରୀ ନାଖେ ଛେ, ତେଵୀ ରୀତେ, ଦୀର୍ଘକାଳଥୀ ସଂଚିତ କରେଲା (ଅନେକ ଭଵୋମାଂ ସଂଚିତ କରେଲା) କର୍ମରାଶିନେ
ଅନ୍ତର୍ମୁହୂର୍ତମାଂ ଭସ୍ମ କରୀ ନାଖେ ଛେ
ନଷ୍ଟ କରୀ ଦେ ଛେ.
ଅହୀଂ, ଆଵୁଂ ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମଧ୍ଯାନନୁଂ ସାମର୍ଥ୍ଯ ଜାଣୀନେ ତେ ଜ ନିରଂତର ଭାଵଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ, ଏଵୋ
ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୧୧୪.
ହଵେ, ହେ ଜୀଵ! ଚିଂତାଜାଳନୋ ତ୍ଯାଗ କରୀନେ ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମସ୍ଵରୂପନେ ତୁଂ ନିରଂତର ଦେଖ, ଏମ କହେ
ଛେ :
୧ ପାଠାନ୍ତର :स्तोकाग्निके = स्तोकाग्निकणिकानि