Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୧୨୨ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୯୫
अथ रागादिरहिते निजमनसि परमात्मा निवसतीति दर्शयति —
१२२) णिय-मणि णिम्मलि णाणियहँ णिवसइ देउ अणाइ ।
हंसा सरवरि लीणु जिम महु एहउ पडिहाइ ।।१२२।।
निजमनसि निर्मले ज्ञानिनां निवसति देवः अनादिः ।
हंसः सरोवरे लीनः यथा मम ईद्रशः प्रतिभाति ।।१२२।।
णियमणि इत्यादि । णियमणि निजमनसि । किंविशिष्टे । णिम्मलि निर्मले
रागादिमलरहिते । केषां मनसि । णाणियहं ज्ञानिनां णिवसइ निवसति । कोऽसौ । देउ देवः
आराध्यः किंविशिष्टः । अणाइ अनादिः । क इव कुत्र । हंसा सरवरि लीणु जिम हंसः सरोवरे
लीनो यथा हे प्रभाकरभट्ट महु एहउ पडिहाइ ममैवं प्रतिभातीति । तथाहि । पूर्वसूत्रकथितेन
आगे रागादि रहित निज मनमें परमात्मा निवास करता है, ऐसा दिखाते हैं —
गाथा – १२२
अन्वयार्थ : — [ज्ञानिनां ] ज्ञानियोंके [निर्मले ] रागादि मल रहित [निजमनसि ] निज
मनमें [अनादिः देवः ] अनादि देव आराधने योग्य शुद्धात्मा [निवसति ] निवास कर रहा है,
[यथा ] जैसे [सरोवरे ] मानस सरोवरमें [लीनः हंसः ] लीन हुआ हंस बसता है । सो हे
प्रभाकर भट्ट [मम ] मुझे [एवं ] ऐसा [प्रतिभाति ] मालूम पड़ता है । ऐसा वचन श्री
योगीन्द्रदेवने प्रभाकरभट्टसे कहा ।
भावार्थ : — पहले दोहेमें जो कहा था कि चित्तकी आकुलताके उपजानेवाले
स्त्रीरूपका देखना सेवना चिंतादिकोंसे उत्पन्न हुए रागादितरंगोंके समूह हैं, उनकर रहित निज
शुद्धात्मद्रव्यका सम्यक् श्रद्धान स्वाभाविक ज्ञान उससे वीतराग परमसुखरूप अमृतरस उस
स्वरूप निर्मल नीरसे भरे हुए ज्ञानियोंके मानससरोवरमें परमात्मादेवरूपी हंस निरंतर रहता है ।
ହଵେ, ରାଗାଦି ରହିତ ନିଜମନମାଂ ପରମାତ୍ମା ଵସେ ଛେ, ଏମ ଦର୍ଶାଵେ ଛେ : —
ଭାଵାର୍ଥ: — ପୂର୍ଵ ସୂତ୍ରମାଂ କହେଲୀ, ଚିତ୍ତନୀ ଆକୁଳତାନୀ ଉତ୍ପାଦକ ଏଵୀ, ସ୍ତ୍ରୀରୂପନେ
ଦେଖଵାନୀ, ସେଵଵାନୀ ଅଭିଲାଷାଦିଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ରାଗାଦି କଲ୍ଲୋଲମାଳାନୀ ଜାଳଥୀ ରହିତ,
ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯନୀ ସମ୍ଯକ୍ଶ୍ରଦ୍ଧାଥୀ ସହଜ ଉତ୍ପନ୍ନ ଵୀତରାଗ ପରମସୁଖସୁଧାରସସ୍ଵରୂପ ନିର୍ମଳ
ନୀରଥୀ ପୂର୍ଣ, ଵୀତରାଗ ସ୍ଵସଂଵେଦନଜନିତ ମାନସସରୋଵରମାଂ ପରମାତ୍ମା ଲୀନ ରହେ ଛେ. ତେ ପରମାତ୍ମା