Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୧୨୩ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୯୭
देउ इत्यादि । देउ देवः परमाराध्यः ण नास्ति कस्मिन् कस्मिन् नास्ति । देउले
देवकुले देवतागृहे णवि सिलए नैव शिलाप्रतिमायां, णवि लिप्पइ नैव लेपप्रतिमायां, णवि
चित्ति नैव चित्रप्रतिमायाम् । तर्हि क्व तिष्ठति । निश्चयेन अखउ अक्षयः णिरंजणु
कर्माञ्जनरहितः । पुनरपि किंविशिष्टः । णाणमउ ज्ञानमयः केवलज्ञानेन निर्वृत्तः सिउ
शिवशब्द वाच्यो निजपरमात्मा । एवंगुणविशिष्टः परमात्मा देव इति । संठिउ संस्थितः
समचित्ति समभावे समभावपरिणतमनसि इति । तद्यथा । यद्यपि व्यवहारेण धर्मवर्तनानिमित्तं
स्थापनारूपेण पूर्वोक्त गुणलक्षणो देवो देवगृहादौ तिष्ठति तथापिनिश्चयेन शत्रुमित्र-
सुखदुःखजीवितमरणादिसमतारूपे वीतरागसहजानन्दैकरूपपरमात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुभूति-
रूपाभेदरत्नत्रयात्मकसमचित्ते शिवशब्दवाच्यः परमात्मा तिष्ठतीति भावार्थः ।। तथा चोक्तं
समचित्तपरिणतश्रमणलक्षणम् — ‘‘समसत्तुबंधुवग्गो समसुहदुक्खो पसंसणिंदसमो । समलोह-
कंचणो वि य जीविदमरणे समो समणो ।।’’ ।।१२३।। इत्येकत्रिंशत्सूत्रैश्चूलिकास्थलं गतम् ।
विराज रहा है, अन्य जगह नहीं है ।
भावार्थ : — यद्यपि व्यवहारनयकर धर्मकी प्रवृत्तिके लिये स्थापनारूप अरहंतदेव
देवालयमें तिष्ठते हैं, धातु पाषाणकी प्रतिमाको देव कहते हैं तो भी निश्चयनयकर शत्रु मित्र सुख
-दुःख जीवित-मरण जिसके समान हैं, तथा वीतराग सहजानंदस्वरूप परमात्मतत्त्वके सम्यक्
श्रद्धान ज्ञान चारित्ररूप अभेद रत्नत्रयमें लीन ऐसे ज्ञानियोंके सम चित्तमें परमात्मा तिष्ठता है ।
ऐसा ही अन्य जगह भी समचित्तको परिणत हुए मुनियोंका लक्षण कहा है । ‘‘समस्तु’’ इत्यादि ।
इसका अर्थ ऐसा है कि जिसके सब दुःख समान हैं, शत्रु-मित्रोंका वर्ग समान हैं, प्रशंसा निंदा
समान हैं, पत्थर और सोना समान है, और जीवन-मरण जिसके समान हैं, ऐसा समभावका
ଭାଵାର୍ଥ: — ଜୋ କେ ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ ଧର୍ମନୀ ଵର୍ତନା ମାଟେ ସ୍ଥାପନାରୂପେ ପୂର୍ଵୋକ୍ତ ଗୁଣନା
ଲକ୍ଷଣଵାଳା ଦେଵ ଦେଵାଲଯମାଂ ରହେ ଛେ ତୋପଣ, ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ଜେ ଶତ୍ରୁ-ମିତ୍ର, ସୁଖ-ଦୁଃଖ, ଜୀଵିତ-ମରଣ
ଆଦିମାଂ ସମତାରୂପ ଛେ ଅନେ ଜେ ଵୀତରାଗ ସହଜାନଂଦ ଜ ଜେନୁଂ ଏକ ରୂପ ଛେ ଏଵା ପରମାତ୍ମତତ୍ତ୍ଵନାଂ
ସମ୍ଯକ୍ଶ୍ରଦ୍ଧାନ, ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ, ସମ୍ଯଗ୍ଅନୁଭୂତିରୂପ ଅଭେଦ ରତ୍ନତ୍ରଯାତ୍ମକ ସମଚିତ୍ତମାଂ ‘ଶିଵ’ ଶବ୍ଦଥୀ
ଵାଚ୍ଯ ଏଵୋ ପରମାତ୍ମା ରହେ ଛେ. ସମଚିତ୍ତମାଂ ପରିଣତ ଶ୍ରମଣନୁଂ ସ୍ଵରୂପ (ଶ୍ରୀ ପ୍ରଵଚନସାରନା ତ୍ରୀଜା
ଅଧିକାରନୀ ୨୪୧ ଗାଥାମାଂ) କହ୍ଯୁଂ ଛେ କେ ‘‘समसत्तु बंधुवग्गो समसुहदुक्खो पसंसणिंदसमो ।
समलोट्ठुकंचणो पुण जीविदमरणे समो समणो ।।
(ଅର୍ଥ: — ଶତ୍ରୁ ଅନେ ବଂଧୁଵର୍ଗ ଜେନେ ସମାନ ଛେ, ସୁଖ ଅନେ ଦୁଃଖ ଜେନେ ସମାନ ଛେ, ପ୍ରଶଂସା
ଅନେ ନିଂଦା ପ୍ରତ୍ଯେ ଜେନେ ସମତା ଛେ, ଲୋଷ୍ଟ (ମାଟୀନୁଂ ଢେଫୁଂ) ଅନେ କାଂଚନ ଜେନେ ସମାନ ଛେ ତେମ ଜ ଜୀଵିତ
ଅନେ ମରଣ ପ୍ରତ୍ଯେ ଜେନେ ସମତା ଛେ, ତେ ଶ୍ରମଣ ଛେ.) ୧୨୩.