Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୨୦୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୧୨୩
विसयकसायहिं तृतीयान्तं पदं सप्तम्यन्तं कथं जातमिति चेत् परिहारमाह प्राकृते
क्वचित्कारकव्यभिचारो भवति लिङ्गव्यभिचारश्च इदं सर्वत्र ज्ञातव्यम् मोक्खहं कारण
मोक्षस्य कारणं एत्तडउ एतावदेव विषयकषायरतचित्तस्य व्यावर्तनेन स्वात्मनि स्थापनं अण्णु
ण अन्यत् किमपि न मोक्षकारणम् अन्यत् किम् तन्तु तन्त्रं शास्त्रमौषधं वा मंतु मन्त्राक्षरं
चेति तथाहि शुद्धात्मतत्त्वभावनाप्रतिकूलेषु विषयकषायेषु गच्छत् सत् मनो
वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानबलेन व्यावर्त्य निजशुद्धात्मद्रव्ये स्थापयति यः स एव मोक्षं
लभते नान्यो मन्त्रतन्त्रादिबलिष्ठोऽपीति भावार्थः
।।१२३“३।।
एवं परमात्मप्रकाशवृत्तौ प्रक्षेपकत्रयं विहाय त्र्यधिकविंशत्युत्तरशतदोहक-
सूत्रैस्त्रिविधात्मप्रतिपादकनामा प्रथममहाधिकारः समाप्तः।।।।
कषायोंमें जाते हुए मनको वीतरागनिर्विकल्प स्वसंवेदनज्ञानके बलसे पीछे हटाकर निज
शुद्धात्मद्रव्यमें स्थापन करता है, वही मोक्षको पाता है, दूसरा कोई मंत्र-तंत्रादि चतुर होने पर
भी मोक्ष नहीं पाता
।।१२३।।
इस तरह परमात्मप्रकाशकी टीकामें तीन क्षेपकोंके सिवाय एकसौ तेईस दोहा-सूत्रोंमें
बहिरात्मा अंतरात्मारूप परमात्मारूप तीन प्रकारसे आत्माको कहनेवाला पहला महाधिकार
पूर्ण किया ।।।।
इति प्रथम महाधिकार
ସାତମୀନା ପ୍ରତ୍ଯଯ ତରୀକେ କେମ ଲୀଧୋ?
ତେନୁଂ ସମାଧାନ :ପ୍ରାକୃତମାଂ କୋଈ ଵାର କାରକ ଵ୍ଯଭିଚାର ଅନେ ଲିଂଗଵ୍ଯଭିଚାର ଥାଯ ଛେ.
ଆ ବଧେଯ ଜାଣଵୁଂ.
ଭାଵାର୍ଥ:ଜେ (ଜେ କୋଈ ଆସନ୍ନ ଭଵ୍ଯ ଜୀଵ) ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମତତ୍ତ୍ଵନୀ ଭାଵନାଥୀ ପ୍ରତିକୂଳ
ଵିଷଯକଷାଯମାଂ ଜତାଂ ମନନେ ଵୀତରାଗ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସ୍ଵସଂଵେଦନ ଜ୍ଞାନନା ବଳ ଵଡେ ଵ୍ଯାଵୃତ୍ତ କରୀନେ (ପାଛୁଂ
ଵାଳୀନେ) ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯମାଂ ସ୍ଥାପେ ଛେ ତେ ଜ ମୋକ୍ଷ ପାମେ ଛେ. ବୀଜୋ ମଂତ୍ର, ତଂତ୍ର ଆଦିମାଂ ବଲିଷ୍ଠ
ହୋଵା ଛତାଂ ପଣ ମୋକ୍ଷ ପାମତୋ ନଥୀ. ୧୨୩*୩.
ଆ ପ୍ରମାଣେ ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶନୀ ଵୃତ୍ତିମାଂ ତ୍ରଣ ପ୍ରକ୍ଷେପକୋନେ ଛୋଡୀନେ ଏକସୋ ତ୍ରେଵୀସ ଦୋହକସୂତ୍ରୋଥୀ
ତ୍ରଣ ପ୍ରକାରନା ଆତ୍ମାନୋ ପ୍ରତିପାଦକ ନାମନୋ ପ୍ରଥମ ମହାଧିକାର ସମାପ୍ତ ଥଯୋ.
ଇତି ପ୍ରଥମ ମହାଧିକାର.
✲ ✲ ✲