Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
अन्यद् यदि जगतोऽपि अधिकतरः गुणगणः तस्य न भवति ।
ततः त्रिलोकऽपि किं धरति निजशिर उपरि तमेव ।।६।।
अणु इत्यादि । अणु पुनः जइ यदि चेत् जगहँ वि जगतोऽपि सकाशात् अहिययरु
अतिशयेनाधिकः अधिकतरः । कोऽसौ । गुण-गुणु गुणगणः तासु तस्य मोक्षस्य ण होइ न
भवति । तो ततः कारणात् तइलोउ वि त्रिलोकोऽपि कर्ता । किं धरइ किमर्थं धरति ।
कस्मिन् । णिय-सिर-उप्परि निजशिरसि उपरि । किं धरइ किं धरति । सोइ तमेव मोक्षमिति ।
तद्यथा । यदि तस्य मोक्षस्य पूर्वोक्त : सम्यक्त्वादिगुणगणो न भवति तर्हि लोकः कर्ता
निजमस्तकस्योपरि तत्किं धरतीति । अत्रानेन गुणगणस्थापनेन किं कृतं भवति, बुद्धिसुख-
गाथा – ६
अन्वयार्थ : — [अन्यद् ] फि र [यदि ] जो [जगतः अपि ] सब लोकसे भी
[अधिकतरः ] बहुत ज्यादः [गुणगणः ] गुणोंका समूह [तस्य ] उस मोक्षमें [न भवति ] नहीं
होता, [ततः ] तो [त्रिलोकः अपि ] तीनों ही लोक [निजशिरसि ] अपने मस्तकके [उपरि ]
ऊ पर [तमेव ] उसी मोक्षको [किं धरति ] क्यों रखते ? ।
भावार्थ : — मोक्ष लोकके शिखर (अग्रभाग) पर है, सो सब लोकोंसे मोक्षमें बहुत
ज्यादा गुण हैं, इसीलिये उसको लोक अपने सिर पर रखता है । कोई किसीको अपने सिरपर
रखता है, वह अपनेसे अधिक गुणवाला जानकर ही रखता है । यदि क्षायिक – सम्यक्त्व
केवलदर्शनादि अनंत गुण मोक्षमें न होते, तो मोक्ष सबके सिर पर न होता, मोक्षके ऊ पर अन्य
कोई स्थान नहीं हैं, सबके ऊ पर मोक्ष ही है, और मोक्षके आगे अनंत अलोक है, वह शून्य
है, वहाँ कोई स्थान नहीं है । वह अनंत अलोक भी सिद्धोंके ज्ञानमें भास रहा है । यहाँ पर
मोक्षमें अनंत गुणोंके स्थापन करनेसे मिथ्यादृष्टियोंका खंडन किया । कोई मिथ्यादृष्टि
वैशेषिकादि ऐसा कहते हैं, कि जो बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, संस्कार
ଭାଵାର୍ଥ: — ଜୋ ତେ ମୋକ୍ଷମାଂ ପୂର୍ଵୋକ୍ତ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵାଦି ଗୁଣୋ ନ ହୋତ ତୋ ଲୋକ ତେନେ ପୋତାନା
ମସ୍ତକ ଉପର ଶା ମାଟେ ରାଖେ?
ଅହୀଂ, ଆ ଗୁଣଗଣନୀ ସ୍ଥାପନାଥୀ ଶୁଂ କରଵାମାଂ ଆଵ୍ଯୁଂ ଛେ? (ଅହୀଂ, ମୋକ୍ଷମାଂ ଅନଂତ ଗୁଣୋନୁଂ
ସ୍ଥାପନ କରଵାଥୀ ମିଥ୍ଯାଦ୍ରଷ୍ଟିଓନୁଂ ଖଂଡନ କରଵାମାଂ ଆଵ୍ଯୁଂ ଛେ ତେ ଶୀ ରୀତେ) ତେ କହେ ଛେ : —
(୧)ବୁଦ୍ଧି, ସୁଖ, ଦୁଃଖ, ଇଚ୍ଛା, ଦ୍ଵେଷ, ପ୍ରଯତ୍ନ, ଧର୍ମ, ଅଧର୍ମ, ସଂସ୍କାର ନାମନା ନଵ ଗୁଣୋନା
ଅଭାଵନେ ମୋକ୍ଷ ଵୈଶେଷିକୋ ମାନେ ଛେ; ତେନୋ ନିଷେଧ କର୍ଯୋ ଛେ.
୨୦୮ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୬