Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୮ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୫୭
भवन्ति जीवपुद्गलकालद्रव्याणि पुनरनेकानि भवन्ति । ‘खेत्त’ सर्वद्रव्याणामवकाशदानसामर्थ्यात्
क्षेत्रमाकाशमेकं शेषपञ्चद्रव्याण्यक्षेत्राणि । ‘किरिया य’ क्षेत्रात्क्षेत्रान्तरगमनरूपा परिस्पन्दवती
चलनवती क्रिया सा विद्यते ययोस्तौ क्रियावन्तौ जीवपुद्गलौ धर्माधर्माकाशकालद्रव्याणि
पुनर्निष्क्रियाणि । ‘णिच्चं’ धर्माधर्माकाशकालद्रव्याणि यद्यप्यर्थपर्यायत्वेनानित्यानि तथापि
मुख्यवृत्त्या विभावव्यञ्जनपर्यायाभावात् नित्यानि द्रव्यार्थिकनयेन च, जीवपुद्गलद्रव्ये पुनर्यद्यपि
द्रव्यार्थिकनयापेक्षया नित्ये तथाप्यगुरुलघुपरिणति१रूपस्वभावपर्यायापेक्षया विभावव्यञ्जन-
पर्यायापेक्षया चानित्ये । ‘कारण’ पुद्गलधर्माधर्माकाशकालद्रव्याणि व्यवहारनयेन जीवस्य शरीर-
वाङ्मनःप्राणापानादिगतिस्थित्यवगाहवर्तनाकार्याणि कुर्वन्ति इति कारणानि भवन्ति, जीवद्रव्यं
(୬) ‘खेत्तखेत्त’ ସର୍ଵ ଦ୍ରଵ୍ଯୋନେ ଅଵକାଶ ଦେଵାନୁଂ ସାମର୍ଥ୍ଯ ହୋଵାଥୀ ଆକାଶ ଏକ ଜ କ୍ଷେତ୍ର ଛେ,
ଜ୍ଯାରେ ବାକୀନା ପାଂଚ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ତୋ ଅକ୍ଷେତ୍ର ଛେ.
(୭) ‘किरिया यकिरिया य’ ଏକ କ୍ଷେତ୍ରଥୀ ବୀଜା କ୍ଷେତ୍ରମାଂ ଗମନରୂପ ପରିସ୍ପଂଦଵାଳୀ-ଚଲନଵାଳୀ-କ୍ରିଯା
ତେ ଜେମନେ ଵର୍ତେ ଛେ ଏଵା ଜୀଵ ଅନେ ପୁଦ୍ଗଲ ଏ ବେ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ କ୍ରିଯାଵାନ ଛେ, ଜ୍ଯାରେ ଧର୍ମ, ଅଧର୍ମ ଆକାଶ
ଅନେ କାଳ ଏ ଚାର ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ତୋ ନିଷ୍କ୍ରିଯ ଛେ.
(୮) ‘णिच्चणिच्च’ ଧର୍ମ, ଅଧର୍ମ, ଆକାଶ ଅନେ କାଳ ଏ ଚାର ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ଜୋକେ ଅର୍ଥପର୍ଯାଯନୀ
ଅପେକ୍ଷାଏ ଅନିତ୍ଯ ଛେ, ତୋପଣ-ମୁଖ୍ଯପଣେ ତେମନେ ଵିଭାଵଵ୍ଯଂଜନପର୍ଯାଯ ନହି ହୋଵାଥୀ ଦ୍ରଵ୍ଯାର୍ଥିକ ନଯଥୀ
ନିତ୍ଯ ଛେ ଜ୍ଯାରେ ଜୀଵପୁଦ୍ଗଲଦ୍ରଵ୍ଯ ତୋ-ଜୋକେ ଦ୍ରଵ୍ଯାର୍ଥିକନଯନୀ ଅପେକ୍ଷାଏ ନିତ୍ଯ ଛେ ତୋପଣ ଅଗୁରୁ-
ଲଘୁପରିଣତିରୂପ ସ୍ଵଭାଵପର୍ଯାଯନୀ ଅପେକ୍ଷାଏ ଅନେ ଵିଭାଵଵ୍ଯଂଜନପର୍ଯାଯନୀ ଅପେକ୍ଷାଏ ଅନିତ୍ଯ ଛେ.
(୯) ‘कारणकारण’ ପୁଦ୍ଗଲ, ଧର୍ମ, ଅଧର୍ମ, ଆକାଶ ଅନେ କାଳ ଏ ପାଂଚ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ, ଵ୍ଯଵହାର-
ନଯଥୀ ଶରୀର, ଵାଣୀ, ମନ, ଶ୍ଵାସୋଚ୍ଛ୍ଵାସ ଆଦିରୂପ, ଗତି, ସ୍ଥିତି, ଅଵଗାହନ, ଵର୍ତନାରୂପ ଜୀଵନାଂ
दोनोंको ही अनित्य कहा है, अन्य चार द्रव्य विभावके अभावसे नित्य ही हैं, इस कारण यह
निश्चयसे जानना कि चार नित्य हैं, दो अनित्य हैं, तथा द्रव्यकर सब ही नित्य हैं, कोई भी
द्रव्य विनश्वर नहीं है, जीवको पाँचों ही द्रव्य कारणरूप हैं, पुद्गल तो शरीरादिकका कारण
है, धर्म-अधर्मद्रव्य गति स्थितिके कारण हैं, आकाशद्रव्य अवकाश देनेका कारण है, और काल
वर्तनाका सहायी है । ये पाँचों द्रव्य जीवको कारण हैं, और जीव उनको कारण नहीं है । यद्यपि
जीवद्रव्य अन्य जीवोंको गुरु शिष्यादिरूप परस्पर उपकार करता है, तो भी पुद्गलादि पाँच
द्रव्योंको अकारण है, और ये पाँचों कारण हैं, शुद्ध पारिणामिक परमभावग्राहक
शुद्धद्रव्यार्थिकनयकर यह जीव यद्यपि बंध, मोक्ष, पुण्य, पापका कर्ता नहीं है, तो भी
अशुद्धनिश्चयनयकर शुभ-अशुभ उपयोगसे परिणत हुआ पुण्य-पापके बंधका कर्ता होता है, और
ପାଠାନ୍ତର : — रूप = स्वरूप