Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୩୦ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୬୩
परद्रव्यं च संशयविपर्ययानध्यवसायरहितेन ज्ञानेन पूर्वं ज्ञात्वा शङ्कादिदोषरहितेन सम्यक्त्व-
परिणामेन श्रद्धाय च यः कर्ता मायामिथ्यानिदानशल्यप्रभृतिसमस्तचिन्ताजालत्यागेन निजशुद्धात्म-
स्वरूपे परमानन्दसुखरसास्वादतृप्तो भूत्वा तिष्ठति स पुरुष एवाभेदेन निश्चयचारित्रं भवतीति
भावार्थः ।।३०।। एवं मोक्षमोक्षफ लमोक्षमार्गादिप्रतिपादक द्वितीयमहाधिकारमध्ये निश्चयव्यवहार-
मोक्षमार्गमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं षड्द्रव्यश्रद्धानलक्षणव्यवहारसम्यक्त्वव्याख्यानमुख्यत्वेन सूत्राणि चतुर्दश,
सम्यग्ज्ञानचारित्रमुख्यत्वेन सूत्रद्वयमिति समुदायेनैकोनविंशतिसूत्रस्थलं समाप्तम् ।
अथानन्तरमभेदरत्नत्रयव्याख्यानमुख्यत्वेन सूत्राष्टकं कथ्यते, तत्रादौ तावत् रत्नत्रय-
भक्त भव्यजीवस्य लक्षणं प्रतिपादयति —
१५७) जो भत्तउ रयण – त्तयहँ तसु मुणि लक्खणु एउ ।
अप्पा मिल्लिवि गुण-णिलउ तासु वि अण्णु ण झेउ ।।३१।।
ସୁଖରସାସ୍ଵାଦଥୀ ତୃପ୍ତ ଥଈନେ ଜେ ସ୍ଥିତି ରହେ ଛେ ତେ ପୁରୁଷ ଜ ଅଭେଦଥୀ (ଅଭେଦନଯଥୀ)
ନିଶ୍ଚଯଚାରିତ୍ର ଛେ. ୩୦.
ଆ ପ୍ରମାଣେ ମୋକ୍ଷ, ମୋକ୍ଷଫଳ, ମୋକ୍ଷମାର୍ଗାଦିନା ପ୍ରତିପାଦକ ବୀଜା ମହାଧିକାରମାଂ
ନିଶ୍ଚଯଵ୍ଯଵହାରମୋକ୍ଷମାର୍ଗନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ତ୍ରଣ ଗାଥାସୂତ୍ରୋ, ଛ ଦ୍ରଵ୍ଯୋନୀ ଶ୍ରଦ୍ଧା ଜେନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ଛେ ଏଵା
ଵ୍ଯଵହାରସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନା ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ଚୌଦ ଗାଥାସୂତ୍ରୋ ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ ଅନେ ସମ୍ଯକ୍ଚାରିତ୍ରନୀ
ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ବେ ସୂତ୍ରୋ ଏ ପ୍ରମାଣେ ସମୁଦାଯରୂପେ ଓଗଣୀସ ସୂତ୍ରୋନୁଂ ସ୍ଥଳ ସମାପ୍ତ ଥଯୁଂ.
ତ୍ଯାର ପଛୀ ଅଭେଦ ରତ୍ନତ୍ରଯନା ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ଆଠ ସୂତ୍ରୋ କହେ ଛେ, ତେମାଂ ପ୍ରଥମ
ତୋ ରତ୍ନତ୍ରଯନା ଭକ୍ତ ଭଵ୍ଯ ଜୀଵନୁଂ ଲକ୍ଷଣ କହେ ଛେ : —
सुखरसके आस्वादसे तृप्त हुआ पुरुष ही अभेदनयसे निश्चयचारित्र है ।।३०।।
इसप्रकार मोक्ष, मोक्षका फ ल, मोक्षका मार्ग इनको कहनेवाले दूसरे महाधिकारमें
निश्चय व्यवहाररूप निर्वाणके पंथकी मुख्यतासे तीन दोहोंमें व्याख्यान किया, और चौदह
दोहोंमें छह द्रव्यकी श्रद्धारूप व्यवहारसम्यक्त्वका व्याख्यान किया, तथा दो दोहोंमें
सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्रका मुख्यतासे वर्णन किया । इसप्रकार उन्नीस दोहोंका स्थल पूरा
हुआ ।
आगे अभेदरत्नत्रयके व्याख्यानकी मुख्यतासे आठ दोहा – सूत्र कहते हैं, उनमेंसे पहले
रत्नत्रयके भक्त भव्यजीवके लक्षण कहते हैं —