Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-32 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୨୬୬ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୩୨
१५८) जे रयणत्तउ णिम्मलउ णाणिय अप्पु भणंति
ते आराहय सिवपयहँ णियअप्पा झायंति ।।३२।।
ते रत्नत्रयं निर्मलं ज्ञानिनः आत्मानं भणन्ति
ते आराधकाः शिवपदस्य निजात्मानं ध्यायन्ति ।।३२।।
जे इत्यादि ये केचन रयण-त्तउ रत्नत्रयम् कथंभूतम् णिम्मलउ निर्मलं
रागादिदोषरहितम् कथंभूता ये णाणिय ज्ञानिनः किं कुर्वन्ति अप्पु भणंति
पूर्वोक्त रत्नत्रयस्वरूपमेवात्मानं, आत्मस्वरूपं कर्मतापन्नं भणंति मन्यते ते आराहय ते पूर्वोक्त ाः
पुरुषाः आराधका भवन्ति
कस्य सिव-पयहं शिवपदस्य शिवशब्दवाच्यमोक्षपदस्य
मोक्षपदाराधकाः सन्तः किं कुर्वन्ति णिय-अप्पा झायंति निजात्मानं कर्मतापन्नं ध्यायन्ति
इति तथा च ये केचन वीतरागस्वसंवेदनज्ञानिनः परमात्मानं सम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानलक्षणं
निश्चयरत्नत्रयमेवाभेदनयेन निजशुद्धात्मानं मन्यन्ते ते शिवशब्दवाच्यमोक्षपदाराधका भवन्ति
आराधकाः सन्तः किं ध्यायन्ति विशुद्धज्ञानदर्शनं स्वशुद्धात्मस्वरूपं निश्चयनयेन ध्यायन्ति
ଭାଵାର୍ଥ:ଜେ କୋଈ ଜ୍ଞାନୀଓ ନିର୍ମଳ-ରାଗାଦି ଦୋଷ ରହିତ-ରତ୍ନତ୍ରଯନେ ରତ୍ନତ୍ରଯସ୍ଵରୂପ
ଆତ୍ମାନେ ଜ-ଆତ୍ମାନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ମାନେ ଛେ ତେ ପୁରୁଷୋ ‘ଶିଵ’ ପଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵା ମୋକ୍ଷପଦନା ଆରାଧକୋ
ଛେ, ମୋକ୍ଷପଦନା ଆରାଧକୋ ନିଜ ଆତ୍ମାନେ ଧ୍ଯାଵେ ଛେ.
ଵିସ୍ତାର :ଜେ କୋଈ ଵୀତରାଗ ସ୍ଵସଂଵେଦନଵାଳା ଜ୍ଞାନୀଓ ପରମାତ୍ମାନେ ସମ୍ଯକ୍ଶ୍ରଦ୍ଧାନ
ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ, ସମ୍ଯଗ୍ଅନୁଷ୍ଠାନରୂପ ନିଶ୍ଚଯରତ୍ନତ୍ରଯନେ ଜ ଅଭେଦନଯଥୀ ନିଜ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନେ ମାନେ ଛେ,
ତେଓ ‘ଶିଵ’ ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵା ମୋକ୍ଷପଦନା ଆରାଧକୋ ଛେ.
ତେ ଆରାଧକୋ କୋନେ ଧ୍ଯାଵେ ଛେ? ତେ ଆରାଧକୋ ଵିଶୁଦ୍ଧଜ୍ଞାନଦର୍ଶନଵାଳା ସ୍ଵଶୁଦ୍ଧାତ୍ମସ୍ଵରୂପନେ
गाथा३२
अन्वयार्थ :[ये ज्ञानिनः ] जो ज्ञानी [निर्मलं रत्नत्रयं ] निर्मल रागादि दोष रहित
रत्नत्रयको [आत्मानं ] आत्मा [भणंति ] कहते हैं [ते ] वे [शिवपदस्य आराधकाः ] शिवपदके
आराधक हैं, और वे ही [निजात्मानं ] मोक्षपदके आराधक हुए अपने आत्माको [ध्यायंति ]
ध्यावते हैं
।।
भावार्थ :जो कोई वीतराग, स्वसंवेदनज्ञानी, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान सम्यक्-
चारित्ररूप आत्माको मानते हैं, वे ही मोक्षपदके आराधक हुए निश्चयनयकर केवल