Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୩୬ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୭୫
दुक्खु वि इत्यादि दुक्खु वि सुक्खु सहंतु दुःखमपि सुखमपि समभावेन सहमानः
सन् जिय हे जीव कोऽसौ कर्ता णाणिउ वीतरागस्वसंवेदनज्ञानी किंविशिष्टः झाण-णिलीण
वीतरागचिदानन्दैकाग्र्यध्याननिलीनो रतः स एवाभेदेन कम्माहं णिज्जर-हेउ शुभाशुभकर्मणो
निर्जराहेतुरुच्यते न केवलं ध्यानपरिणतपुरुषो निर्जराहेतुरुच्यते
तउ परद्रव्येच्छानिरोधरूपं
बाह्याभ्यन्तरलक्षणं द्वादशविधं तपश्च
किंविशिष्टः स तपोधनस्तत्तपश्च संगविहीनो संग-विहीणु
बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहरहित इति अत्राह प्रभाकरभट्टः ध्यानेन निर्जरा भणिता भवद्भिः
उत्तमसंहननस्यैकाग्रचित्तनिरोधो ध्यानमिति ध्यानलक्षणं, उत्तमसंहननाभावे कथं ध्यानमिति
भगवानाह उत्तमसंहननेन यद्धयानं भणितं तदपूर्वगुणस्थानादिषूपशमक्षपकश्रेण्योर्यत् शुक्लध्यानं
ଭାଵାର୍ଥ:ଅହୀ ପ୍ରଭାକରଭଟ୍ଟ ପୂଛେ ଛେ କେ ଆପେ ଧ୍ଯାନଥୀ ନିର୍ଜରା କହୀ ପଣ
ଉତ୍ତମସଂହନନଵାଳାନେ ଏକାଗ୍ରଚିତ୍ତନିରୋଧ ତେ ଧ୍ଯାନ ଛେ, ଏଵୁଂ ଧ୍ଯାନନୁଂ ଲକ୍ଷଣ ଛେ ତୋ ପଛୀ (ଅତ୍ଯାରେ)
ଉତ୍ତମସଂହନନା ଅଭାଵମାଂ ଧ୍ଯାନ କେଵୀ ରୀତେ ହୋଯ?
ଭଗଵାନ ଶ୍ରୀଗୁରୁ କହେ ଛେଉତ୍ତମସଂହନନ ଵଡେ ଜେ ଧ୍ଯାନ କହେଵାମାଂ ଆଵ୍ଯୁଂ ଛେ ତେ ଅପୂର୍ଵ
ଗୁଣସ୍ଥାନାଦିମାଂ ଉପଶମ-କ୍ଷପକ ଶ୍ରେଣୀଓମାଂ ଜେ ଶୁକ୍ଲଧ୍ଯାନ ହୋଯ ଛେ ତେନୀ ଅପେକ୍ଷାଏ କହେଵାମାଂ ଆଵ୍ଯୁଂ
ଛେ. ପଣ ଅପୂର୍ଵକରଣ ଗୁଣସ୍ଥାନଥୀ ନୀଚେନା ଗୁଣସ୍ଥାନୋମାଂ ତେ ଧର୍ମଧ୍ଯାନନୁଂ ନିଷେଧକ ନଥୀ (ଧର୍ମଧ୍ଯାନନୀ
ଆଗମମାଂ ନା କହୀ ନଥୀ) (ଶ୍ରୀ ରାମସେନ କୃତ) ତତ୍ତ୍ଵାନୁଶାସନ ନାମନା ଗ୍ରଂଥମାଂ (ଗାଥା ୮୪ମାଂ)
आत्मध्यानमें लीन [दुःखम् अपि सुखं ] दुःख और सुखको [सहमानः ] समभावोंसे सहता
हुआ अभेदनयसे [कर्मणः निर्जराहेतुः ] शुभ अशुभ कर्मोंकी निर्जराका कारण है, ऐसा
भगवान्ने [उच्यते ] कहा है, और [संगविहीनः तपः ] बाह्य अभ्यंतर परिग्रह रहित परद्रव्यकी
इच्छाके निरोधरूप बाह्य अभ्यंतर अनशनादि बारह प्रकारके तपरूप भी वह ज्ञानी है
भावार्थ :यहाँ प्रभाकरभट्टने प्रश्न किया, कि हे प्रभो; आपने ध्यानसे निर्जरा कही,
वह ध्यान एकाग्र चित्तका निरोधरूप उत्तम संहननवाले मुनिके होता है, जहाँ उत्तमसंहनन
ही नहीं है, वहाँ ध्यान किस तरहसे हो सकता है ? उसका समाधान श्रीगुरु कहते हैं
उत्तम संहननवाले मुनिके जो ध्यान कहा है, वह आठवें गुणस्थानसे लेकर उपशम
क्षपकश्रेणीवालोंके जो शुक्लध्यान होता है, उसकी अपेक्षा कहा गया है
उपशमश्रेणी
वज्रवृषभनाराच, वज्रनाराच, नाराच इन तीन संहननवालोंके होती है, उनके शुक्लध्यानका पहला
पाया है, वे ग्यारहवें गुणस्थानसे नीचे आते हैं, और क्षपकश्रेणी एक वज्रवृषभनाराच
संहननवालेके ही होती है, वे आठवें गुणस्थानमें क्षपकश्रेणी माँड़ते (प्रारंभ करते) हैं, उनके
आठवें गुणस्थानमें शुक्लध्यानका पहला पाया (भेद) होता है, वह आठवें, नववें, दशवें